सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

बरनवापारा में हाथियों की बढ़ती दस्तक : जंगल, की निगरानी और सह-अस्तित्व की कहानी

 बरनवापारा में हाथियों की बढ़ती दस्तक : जंगल, की निगरानी और सह-अस्तित्व की कहानी


अलताफ़ हुसैन /फोटो कृशानु चंद्राकर अधीक्षक बार

 रायपुर (छत्तीसगढ़ वनोंदय पत्रिका) छत्तीसगढ़ के हरे-भरे प्राकृतिक परिदृश्य में बसा बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य आज केवल अपनी जैव विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि यहां हाथियों की बढ़ती गतिविधियों के कारण भी चर्चा में है। जंगल में हाथियों की मौजूदगी वन विभाग के लिए संरक्षण की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, वहीं इनके जंगल से बाहर निकलने पर मानव-हाथी संघर्ष की चुनौती भी सामने आती है। ऐसे में निगरानी, त्वरित सूचना तंत्र और ग्रामीणों में जागरूकता इस पूरे प्रयास की महत्वपूर्ण कड़ी बन चुकी हैं।



जंगल जहां हर सुबह एक नई कहानी लिखती है

बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य का प्राकृतिक वातावरण अपने आप में अद्भुत है। घने पेड़ों के बीच से छनकर आती सूर्य की किरणें, शांत जलस्रोत, घास के मैदान और वन्यजीवों की गतिविधियां इस क्षेत्र को विशिष्ट बनाती हैं। सुबह होते ही जंगल में जीवन की हलचल शुरू हो जाती है। कहीं पक्षियों की आवाज सुनाई देती है, तो कहीं वन्यजीव पानी की तलाश में जलस्रोतों की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट और जंगल की प्राकृतिक खामोशी मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाती है, जिसमें प्रकृति स्वयं अपनी कहानी कहती नजर आती है। छत्तीसगढ़ के इसी प्राकृतिक संसार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके  हाथियों की लगातार मौजूदगी ने अभ्यारण्य क्षेत्र मे अनेक प्रकार की जिम्मेदारी और चिंता भी बढ़ा दी है  बरनवापारा क्षेत्र में हाथियों की मौजूदगी कोई बिल्कुल नई घटना नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हाथियों की गतिविधियों और उनके आवागमन को लेकर वन विभाग की निगरानी और सक्रियता बढ़ी है।

वर्ष 2022 के आसपास हाथियों के समूह की गतिविधियां इस क्षेत्र में विशेष रूप से सामने आईं। इसके बाद से हाथियों की मौजूदगी, उनके आवागमन के मार्ग और संभावित संवेदनशील क्षेत्रों पर लगातार नजर रखी जा रही है। बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य लगभग 245 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। घने वन क्षेत्र, घास के मैदान और जलस्रोत हाथियों सहित अनेक वन्यजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराते हैं।हाथियों के लिए जंगल केवल भोजन और पानी पाने की जगह नहीं है। यह उनके पारंपरिक आवागमन मार्ग, सामाजिक जीवन और प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा है।


जंगल में छूटे निशान बनते हैं निगरानी का आधार

हाथियों की निगरानी का काम केवल उन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखने तक सीमित नहीं है। जंगल में हाथी जहां से गुजरते हैं, वहां अनेक संकेत छोड़ जाते हैं। पैरों के निशान, टूटे हुए पेड़, ताजा गोबर, पेड़ों की छाल पर खाने के निशान और वनस्पतियों को नुकसान पहुंचने के तरीके से प्रशिक्षित वनकर्मी उनकी गतिविधियों का अनुमान लगाते हैं। एक अनुभवी निगरानी दल इन छोटे-छोटे संकेतों को जोड़कर यह समझने की कोशिश करता है कि हाथियों का दल किस दिशा में आगे बढ़ा है, उसकी संख्या कितनी हो सकती है और गतिविधि कितनी पुरानी है। यानी जंगल में हाथियों की मौजूदगी का पता लगाने के लिए कई बार हाथियों को देखना जरूरी नहीं होता—उनके पीछे छूटे निशान ही उनकी कहानी बता देते हैं।


रात में और चुनौतीपूर्ण हो जाती है निगरानी

जब सूर्य अस्त होता है और जंगल में अंधेरा उतरने लगता है, तब हाथियों की निगरानी और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

रात के समय हाथियों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में वनकर्मियों को उनकी संभावित लोकेशन पर नजर रखनी पड़ती है और यह पता लगाना होता है कि हाथियों का दल किस दिशा में बढ़ रहा है।हाथियों की सही लोकेशन की जानकारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वन विभाग समय रहते आसपास के ग्रामीणों को सतर्क कर सकता है।

बरनवापारा में हाथियों की निगरानी केवल वन्यजीव संरक्षण का विषय नहीं है। इसके पीछे ग्रामीणों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।


इस संदर्भ मे बार नवा पारा अभ्यारण्या के युवा अधीक्षक कृषानु चंद्राकर का कहना है कि हाथियों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखना विभाग की प्राथमिकताओं में शामिल है। उनका कहना है कि हाथियों की मौजूदगी को समझने के लिए उनके आवागमन, व्यवहार और गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है। हाथियों की लोकेशन की जानकारी मिलने के बाद संवेदनशील क्षेत्रों में वन अमले को सक्रिय किया जाता है तथा ग्रामीणों को समय पर सतर्क करने का प्रयास किया जाता है।उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मानव और हाथी दोनों की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों की जागरूकता बेहद जरूरी है। हाथियों के नजदीक जाने, उन्हें छेड़ने या उनके रास्ते में आने से बचना चाहिए। वन विभाग और स्थानीय समुदाय के बीच बेहतर समन्वय से संघर्ष की घटनाओं को कम किया जा सकता है। 


बार अभ्यारण्य की उत्साही, बहु मुखी प्रतिभा शाली रेंजर रूपेश्वरी दीवान का हाथियों के लगातार मूवमेंट को लेकर उनकी  भूमिका के बारे मे बताती है कि हाथियों की गतिविधियों की निगरानी में मैदानी वन अमले की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। रेंजर रूपेश्वरी दीवान और उनकी पूरी टीम को क्षेत्र में हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखने, उनके संभावित मार्गों की जानकारी जुटाने और संवेदनशील इलाकों में सतर्कता बढ़ाने का काम करना पड़ता है।

साथ ही हाथियों की गतिविधि का पता लगते ही आसपास के क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई जाती है। हाथियों की दिशा और उनकी स्थिति के आधार पर आधुनिक तकनीक संचार माध्यमों से ग्रामीणों को सावधान किया जाता है। उनका कहना है कि हाथियों के साथ सुरक्षित दूरी बनाए रखना सबसे जरूरी है। विशेषकर रात के समय ग्रामीणों को हाथियों की गतिविधि वाले क्षेत्रों में जाने से बचने की बात भी कहती है यही नही मैदानी स्तर पर वनकर्मियों और हाथी मित्र दल के बीच समन्वय इस पूरी व्यवस्था को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बार अभ्यारण्य रेंजर रूपेश्वरी दीवान आगे बताती है कि हाथियों की गतिविधि की जानकारी केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह सूचना समय पर ग्रामीणों तक पहुंचना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।इसी उद्देश्य से हाथी मित्र दल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैसे ही हाथियों की मौजूदगी की जानकारी मिलती है, आसपास के गांवों में सूचना पहुंचाई जाती है।ग्रामीणों को बताया जाता है कि हाथी किस दिशा में बढ़ रहे हैं और किन क्षेत्रों में सावधानी बरतने की आवश्यकता है।कई स्थानों पर मुनादी के माध्यम से भी ग्रामीणों को सचेत किया जाता है। ग्रामीणों से कहा जाता है कि रात के समय अनावश्यक रूप से घरों से बाहर न निकलें, हाथियों के नजदीक जाने की कोशिश न करें और हाथियों को घेरने या भगाने का प्रयास कतई  न करें। क्योंकि जंगल में एक छोटी-सी असावधानी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।


हाथियों के दल में मादा और बच्चों की महत्वपूर्ण भूमिका

हाथियों के सामाजिक जीवन को देखें तो उनका समूह अपने आप में एक संगठित परिवार की तरह होता है।दल की अनुभवी मादा हाथियों को जंगल के रास्तों और संसाधनों की गहरी जानकारी होती है। उन्हें पता होता है कि कहां भोजन उपलब्ध हो सकता है, किस दिशा में पानी का स्रोत है और किन रास्तों से आगे बढ़ना अपेक्षाकृत सुरक्षित है।छोटे हाथी अक्सर अपनी मां और समूह की अन्य मादा हाथियों के साथ चलते हैं। इसलिए हाथियों के दल को देखकर उन्हें परेशान करना या उनके रास्ते को रोकना बेहद खतरनाक हो सकता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, हाथियों को शांत वातावरण और पर्याप्त दूरी देना ही सबसे सुरक्षित तरीका है।

जब हाथी जंगल से खेतों की ओर बढ़ते हैं

मानव-हाथी संघर्ष की सबसे बड़ी चुनौती तब सामने आती है, जब हाथियों का दल जंगल से निकलकर खेतों या आबादी के आसपास पहुंच जाता है।

किसानों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक होती है। महीनों की मेहनत से तैयार फसल हाथियों की आवाजाही से कुछ ही समय में प्रभावित हो सकती है।


यहीं से संरक्षण की चुनौती और जटिल हो जाती है।

एक ओर हाथी अपने प्राकृतिक व्यवहार के अनुसार भोजन और पानी की तलाश में आगे बढ़ते हैं, दूसरी ओर खेतों और गांवों में रहने वाले लोगों के लिए उनकी मौजूदगी आर्थिक नुकसान और सुरक्षा की चिंता पैदा करती है।

इसलिए समाधान केवल हाथियों को भगाने में नहीं है।

समाधान है—समय पर सूचना, बेहतर निगरानी, ग्रामीण जागरूकता और वन विभाग तथा स्थानीय समुदाय के बीच मजबूत समन्वय।

सह-अस्तित्व ही सबसे बड़ा समाधान

बरनवापारा में हाथियों की कहानी केवल वन्यजीव संरक्षण की कहानी नहीं है। यह इंसान और प्रकृति के बीच संबंध की भी कहानी है।।हाथी जंगल की सीमा को उस तरह नहीं समझते, जिस तरह इंसान नक्शे और सीमाओं के माध्यम से समझता है। उनके लिए जंगल, पानी, भोजन और पारंपरिक आवागमन मार्ग एक प्राकृतिक परिदृश्य का हिस्सा हैं। इसीलिए हाथियों को केवल एक क्षेत्र में रोक देना आसान समाधान नहीं है।जरूरत इस बात की है कि उनके आवागमन को समझा जाए, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की जाए और उन क्षेत्रों में पहले से सतर्कता बरती जाए। आज वन्यजीव निगरानी में तकनीक का महत्व लगातार बढ़ रहा है। कैमरा, संचार व्यवस्था, लोकेशन संबंधी जानकारी और अन्य आधुनिक साधनों से निगरानी को बेहतर बनाया जा सकता है। लेकिन जंगल को समझने वाले मैदानी वनकर्मियों का अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किस दिशा में टूटे पेड़ मिले हैं, गोबर कितना ताजा है, पैरों के निशान किस ओर जा रहे हैं और वनस्पतियों पर किस तरह के खाने के निशान हैं—इन संकेतों को समझने में वर्षों का अनुभव काम आता है।तकनीक और मानवीय मूल्यों और अनुभव का यही मेल हाथियों की निगरानी को अधिक प्रभावी बना सकता है।



एक जंगल, दो पक्ष और एक साझा भविष्य

बरनवापारा में हाथियों की मौजूदगी प्रकृति के स्वस्थ और जीवंत होने का संकेत भी है। लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है।

हाथियों को सुरक्षित रखना है।

जंगल को सुरक्षित रखना है।

किसानों की आजीविका की रक्षा करनी है।

और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है।

इन सभी लक्ष्यों को साथ लेकर चलना ही असली चुनौती है।

बरनवापारा की कहानी हमें यह सिखाती है कि वन्यजीव संरक्षण केवल जंगल के भीतर की गतिविधि नहीं है। इसका सीधा संबंध जंगल के आसपास रहने वाले लोगों से भी है।

जब वन विभाग निगरानी करता है, हाथी मित्र दल सूचना पहुंचाता है, ग्रामीण सावधानी बरतते हैं और वन्यजीवों के व्यवहार को समझने की कोशिश की जाती है—तभी सह-अस्तित्व की राह मजबूत होती है।



रात के सन्नाटे में जब हाथियों का दल जंगल की पगडंडी पर आगे बढ़ता है, तो वह अपने साथ केवल एक यात्रा नहीं कर रहा होता। वह जंगल के उस प्राकृतिक अधिकार की कहानी भी कह रहा होता है, जिसमें हर जीव के लिए जगह है। बरनवापारा में हाथियों की मौजूदगी हमें याद दिलाती है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं है। यह अनगिनत जीवों का घर है और एक ऐसा जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसमें इंसान भी कहीं न कहीं सहभागी है। हाथियों को जंगल और गांव की मानवीय सीमाएं समझाना संभव नहीं।लेकिन इंसान इतना जरूर सीख सकता है कि जंगल के इन विशाल मेहमानों के साथ कैसे सुरक्षित दूरी, समझदारी और संवेदनशीलता के साथ रहा जाए।क्योंकि संरक्षण का अंतिम उद्देश्य हाथियों को इंसानों से दूर करना नहीं, बल्कि ऐसा संतुलन बनाना है जिसमें हाथी भी सुरक्षित रहें और इंसान भी।यही बरनवापारा की सबसे बड़ी कहानी है—जंगल की कहानी, हाथियों की कहानी और सह-अस्तित्व की कहानी।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

छ्ग वन कर्मचारी संघ की चेतावनी ठेका पद्धति जारी हुई तो चरण बद्ध आंदोलन - अजीत दुबे

 छ्ग वन कर्मचारी संघ की चेतावनी ठेका पद्धति जारी हुई तो चरण बद्ध आंदोलन - अजीत दुबे


रायपुर (फॉरेस्ट क्राइम न्यूज़) वन कर्मचारी संघ, रायपुर ने वन विभाग में वन क्षेत्रों के भीतर सिविल निर्माण एवं अन्य विभागीय कार्यों को ठेका पद्धति से कराए जाने तथा इससे मैदानी वन कर्मचारियों के अधिकारों एवं दायित्वों के सीमित होने की आशंका पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संघ ने इस संबंध में माननीय मुख्यमंत्री, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री तथा वित्त मंत्री को पत्र प्रेषित कर ठेका पद्धति पर पुनर्विचार की मांग की है। 


संघ का कहना है कि वन विभाग के मैदानी कर्मचारी विषम एवं कठिन परिस्थितियों में वन एवं वन्यप्राणियों की सुरक्षा, संरक्षण तथा विभागीय कार्यों का निरंतर निर्वहन करते हैं। वन क्षेत्रों की वास्तविक परिस्थितियों और आवश्यकताओं की जानकारी मैदानी कर्मचारियों को सबसे अधिक होती है। ऐसे में वन क्षेत्रों के अंदर होने वाले निर्माण एवं अन्य कार्यों को ठेका पद्धति से कराने के स्थान पर विभागीय मैदानी अमले के माध्यम से कराया जाना अधिक प्रभावी एवं व्यावहारिक होगा।


संघ ने वन क्षेत्रों के अंदर एवं बाहर ठेका पद्धति पर तत्काल रोक, विभागीय कार्यों को मैदानी कर्मचारियों के माध्यम से संपादित कराने तथा ठेके के माध्यम से कराए जाने वाले कार्यों की गुणवत्ता, मापदंड एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की है। साथ ही ठेकेदारों द्वारा किए जाने वाले कार्यों की तकनीकी एवं गुणवत्ता संबंधी संपूर्ण जवाबदेही संबंधित ठेकेदार एवं सक्षम अधिकारी पर निर्धारित करने की मांग रखी गई है। 


संघ ने यह भी स्पष्ट किया है कि मैदानी वन कर्मचारियों के पारंपरिक कार्यक्षेत्र, अधिकार एवं दायित्वों को सीमित करने अथवा उन्हें विभागीय कार्यों से अलग करने संबंधी किसी भी प्रस्ताव या निर्णय पर तत्काल रोक लगाई जाए। मैदानी कर्मचारियों को आवश्यक संसाधन, अधिकार एवं कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान की जानी चाहिए। 


छत्तीसगढ़ वन कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष अजित दुबे ने कहा कि वन एवं वन्यप्राणियों का संरक्षण केवल कागजी प्रक्रिया से संभव नहीं है। इसके लिए मजबूत, सक्षम और जिम्मेदार मैदानी अमला आवश्यक है। संघ ने शासन से आग्रह किया है कि वन क्षेत्रों की सुरक्षा, स्थानीय परिस्थितियों, वन कर्मचारियों के अधिकारों तथा विभागीय व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए ठेका पद्धति के संबंध में सकारात्मक निर्णय लिया जाए।


संघ ने चेतावनी दी है कि यदि वन क्षेत्रों में ठेका पद्धति जारी रखी जाती है, मैदानी वन कर्मचारियों के अधिकार एवं दायित्व सीमित किए जाते हैं अथवा संघ की जायज मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता, तो संगठन लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से चरणबद्ध आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा। 



सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

रेत के टीले मे हरियाली का जंगल 20 हेक्टेयर में मिश्रित प्रजातियों का वृक्षारोपण, 99 प्रतिशत पौधे स्वस्थ

 रेत के टीले मे हरियाली का जंगल  20 हेक्टेयर में मिश्रित प्रजातियों का वृक्षारोपण, 99 प्रतिशत पौधे स्वस्थ

अलताफ़ हुसैन

रायपुर (छत्तीसगढ़ वनोदय ) अरपा,लीलगर,नदी, शिवनाथ महानदी से लगे त्रिवेणी संगम से नदी तट पर हरियाली की ब्यार बहाना तथा वृक्षारोपण जैसी चुनौतियों को स्वीकार कर उसका अविश्वसनीय काया कल्प करना अत्यंत दुर्लभ एवं कठिन कार्य है परंतु इस चुनौती को स्वीकार कर वन अनुसंधान विस्तार वन विभाग के कसडोल इकाई के कर्मठ जुझारू वन कर्मियों ने  कथित रेतीले टीले क्षेत्र मे वृक्षारोपण कार्य कर वो अविश्वसनीय कार्य कर दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नही की होगी यह तो वही उक्ति चरितार्थ लगती है कि सागर  मरुस्थल मे रेत का कल्पनिक किला का निर्माण करना  जो सागर के बहते एक थपेड़े मे सब कुछ समतल हो जाना लगता है परंतु कठिन परिश्रम,कार्यों के प्रति जीवटता एवं चुनौतियों को स्वीकार कर  दृढ़ इच्छा शक्ति से कुछ नया कर गुजरने की अद्भुत क्षमता किसी के भी व्यक्तित्व को निखार देता है ऐसे दुर्लभ कार्य करने वाले वन अनुसंधान विस्तार वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के तहसील लवन,जिला बलौदाबाजार के उप वन पाल रूपधर नेटी, एवं पवन कुमार साहू वन रक्षक का बहुत बढ़ा योगदान रहा जो आज भी अपने कर्म के प्रति समर्पित भाव से कसडोल इकाई के अंतर्गत ग्राम सुनसुनिया में लगभग 20 हेक्टेयर क्षेत्र में मिश्रित प्रजातियों के पौधे वर्ष 2023 अगस्त मे दो भूभाग क्रमशः, 1727/1मे 16.760हेक्टेयर, एवं 1483/1 मे कुल 3.240 हेक्टेयर भू भाग मे 3गुणित 3 मीटर के अंतराल मे लगाए गए थे।


जो मिश्रित प्रजाति के लगभग 22,000 पौधों का सिंचित प्लांटेशन किया गया था नदी तट रोपण अगस्त मे करने की यह वजह बताई जाती है कि वर्षा ऋतु मे रेतीली जगह होने से भूमि मे नमी बनी रहती है परंतु जैसे ही परिवर्तित ऋतु होने से  महीन बारीक रेतीली कण मिट्टी वायु के परिवर्तित अवस्था मे उनका लगातार संपर्क होने वाली प्रक्रिया से वह अत्यंत कठोर अवस्था मे आ जाता है वन अनुसंधान वन विभाग के युवा एस डी ओ तरुण तिवारी बताते है कि जितनी शीघ्रता से यह जल अवशोषित करता है उतनी ही जल्दी उपरोक्त प्रतिक्रिया से वह कठोर स्थिति मे पहुँच जाता है अब सवाल यह उठता है कि ऐसी अवस्था में  कठोर मृदा की सख्त जमीन मे सिंचाई कैसा किया जाए इस के बारे मे वे आगे बताते है कि ग्रीष्म ऋतु मे रोपण पौधों मे  थाला गाला बना कर सिंचाई व्यवस्था की जाती रही साथ ही उनके दवा खाद, उपचार, निंदाई,गुड़ाई,कर सुरक्षा की जाती रही जिसका परिणाम होने के कारण यहां गर्मी के मौसम में सिंचाई की समस्या के साथ-साथ दीमक और आम के पौधों में कीट लगने की चुनौती भी सामने आती थी जिसका विभाग के वन कर्मी पूरी मुस्तैदी से वृक्षारोपण की सुरक्षा करते रहे । वन विभाग द्वारा समय-समय पर सिंचाई, कीटनाशक एवं आवश्यक छिड़काव कर पौधों की देखरेख की जा रही है।

उप वनपाल रूपधर नेटी, कसडोल के अनुसार विभाग द्वारा कराए गए इस वृक्षारोपण में वर्तमान में करीब 99 प्रतिशत पौधे स्वस्थ हैं। कई पौधे अब लगभग 10 से 11 फीट की ऊंचाई तक पहुंच चुके हैं। पौधों की सुरक्षा और नियमित देखरेख पर विभाग द्वारा लगातार निगरानी रखी जा रही है।

वन अनुसंधान एवं विस्तार, वन मंडल रायपुर से जुड़े वनरक्षक पवन कुमार साहू ने भी वृक्षारोपण स्थल की देखरेख और विभागीय कार्यों की जानकारी दी। उनके अनुसार रेतीली भूमि में पौधों को बचाए रखने के लिए गर्मी के दिनों में सिंचाई पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। सुखी नदी से पानी टैंकर अथवा अन्य कीट नाशक, दवाई, केजयवल्टी पौधों सहित अन्य अति उपयोगी सामाग्री का यहाँ तक पहुंचाना बहुत दुरूह कार्य है दीमक और कीट प्रकोप की स्थिति में कीटनाशक का उपयोग एवं आवश्यक छिड़काव किया जाता है।जिसका प्रतिफल है कि छोटे पौधों मे सीताफल सहित अन्य फल निकल रहे है पवन कुमार साहू आगे बताते है कि  यहाँ अधकांश फलदार एवं औषधि युक्त पौधे रोपे गए है जिनमे मुख्यतः आम, आँवला, करंज, कचनार, बेल, बहड़ा, ईमाली, हर्रा, महुआ,बोहार, सीताफल, नीम, कटहल, एवं वानिकी प्रजाति मे शिशु काला सिरस, खमहार, जैसी प्रजाति लगातार ग्रोथ कर रहे है वन रक्षक पवन साहू कहते है कि 

ईमानदारी से किए जाने वाले कार्य समय आने पर उसका फल मिठा होता है जो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रहा ह वन अनुसंधान एवं विस्तार कसडोल इकाई वन विभाग के

उप वनपाल रूपधर नेटी ने बताया कि उन्होंने अक्टूबर 2013 में सेवा प्रारंभ की थी। विभागीय सेवा के दौरान पौधरोपण एवं उसकी देखरेख से जुड़े वानिकी कार्यों में भी जिम्मेदारी निभाई है। तथा वहीं वनरक्षक के रूप में वर्ष 2011 से कार्यरत रहे और 21 जुलाई 2025 को उप वनपाल के पद पर पदोन्नत हुए। उन्होंने बताया कि वृक्षारोपण क्षेत्र मे लगभग तीन जिला का बॉर्डर है जिनमे बिलासपुर जिला मात्र एक किलोमीटर, जांजगीर जिला पांच किलोमीटर, तथा जहाँ हम खड़े है वह बलौदाबाजार ग्राम चंगोरी कड़काड़ी नाला है जो तीनों जिलों को जोड़ता है उप वन पाल रूपधर नेटी आगे बताते है कि दूसरे भूभाग वृक्षारोपण प्लांटेशन  के समीप प्रति वर्ष सबरी मंदिर का शिवरीनारायण माघ पुन्नी मेला जनवरी फरवरी मे वृहद आयोजन ग्राम पंचायत के मध्यम से किया जाता है जहाँ तीनों जिले के श्रद्धालु बड़ी संख्या मे उपस्थित होकर अपनी मनोकामना पूरी करते है देखा जाए तो यह एक धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व स्थान है जहाँ की हरियाली सब को आकर्षित उत्साहित करती है 


 वनअनुसंधान एवं विस्तार विभाग के डी एफ ओ खेस मैडम  सहित अधिकारियों-कर्मचारियों का कहना है कि पौधरोपण के बाद उस   की नियमित देखरेख ही पौधों के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसी वजह से पौधों की सिंचाई, सुरक्षा तथा कीट नियंत्रण पर लगातार ध्यान दिया जाता रहा है। वर्तमान में अधिकांश पौधों की अच्छी वृद्धि होने से वृक्षारोपण स्थल हराभरा नजर आने लगा है। वन अनुसंधान विस्तार वन विभाग कें 

रेंजर संतोष तंवर को इस इकाई में कार्यभार संभाले लगभग पांच-छह माह हुए हैं। उनके मार्गदर्शन में भी पौधरोपण क्षेत्र की निगरानी एवं रखरखाव का कार्य जारी है।

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

ऐतिहासिक वन संपदा का रक्षक वीर कर्म योगी आशीष खुमरी

 ऐतिहासिक वन संपदा का रक्षक वीर कर्म योगी आशीष खुमरी


अलताफ़ हुसैन

रायपुर (छत्तीसगढ़ वनोदय) महानदी के तट पर बसा सिरपुर (प्राचीन नाम श्रीपुर) भारत की एक महान धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक तपोभूमि है। प्राचीन काल में दक्षिण कोसल की राजधानी रहा यह ऐतिहासिक स्थल, सर्वधर्म समभाव हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का दुनिया का सबसे अनूठा और जीवंत उदाहरण है। प्राचीन काल मे धर्म, अध्यात्म, तपोभूमि स्थल के अलावा धार्मिक संस्कृति का केंद्र बिंदु माना जाता  है ये वह प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है जहाँ लगभग 5वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच अपने  चरमोत्कर्ष पर रहते हुए ।सोमवंशी राजाओं के शासनकाल में अद्भुत कला, विज्ञान और अध्यात्म का वैश्विक केंद्र बना  विशेषकर पांडुवंशी राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन के 57 वर्षों के स्वर्णिम शासनकाल में यहाँ सैकड़ों मंदिरों,जिनमे लक्ष्मण मंदिर,सूरंग टीला और गंधेश्वर महादेव , तालाबों महानदी तट की जलधाराओं के समीप आसपास क्षेत्र मे बसे  बौद्ध एवं जैन धर्म की साधना भूमि  विहारों का निर्माण हुआ। 12वीं शताब्दी के बाद यह समृद्ध शाली शहर किन्ही अज्ञात कारणों या प्राकृतिक आपदाओं की वजह से यह इतिहास के  स्वर्णिम पन्नों में कहीं खो कर घने जंगलों के नीचे दब कर  रह गया जो 19 वी बीसवीं सदी के उत्खनन पश्चात अवशेष प्राप्त होने प्रारंभ हुए जहाँ उपरोक्त धार्मिक,मंदिर् उनके अवशेष, संस्कृति, बौद्ध विहारों के इतिहास का साक्षी बने वही इन्ही से सटे वन क्षेत्र के आज भी गौरवशाली इतिहास उन तथ्यों की गवाही अब भी दे रहे है जिनके संरक्षण संवर्धन  का दायित्व वन विभाग का अनुषंगिक धड़ा छ्ग राज्य वन विकास निगम विगत पचास वर्षों से नियमित रूप से कर रहा है जहाँ विगत अनेक वर्षों से धाकड़ परिक्षेत्राधिकारियों की निगरानी उनकी सुरक्षा एवं रिक्त वन भूमि क्षेत्रों मे सागौन प्लांटेशन का रोपण कर अपनी एवं निगम की  हजारो आश्रित निगम कर्मचारियों की आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था से जीविकोपार्जन कर संचालन कर रहा है 


उसकी हरीतिमा मे आज भी कोई कमी नज़र नही दिखाई देती वल्कि सिरपुर के वन विकास निगम के कर्मयोगी कर्मचारी अपने कर्म स्थल की सुरक्षा उसका अस्तित्व बचाने अपना सर्वस्व न्यौछावर करने से पीछे नही हटते उन्ही कर्मठ,कर्मयोगी, संवेदनशील जांबाज़ व्यक्तित्व का नाम जिस तेजी से उभर कर सामने आता है वह है श्री आशीष कुमार खुमरी का जो वर्तमान मे वन विकास निगम मे सिरपुर परिक्षेत्र के परिक्षेत्राधिकारी (पीआरओ) है उनसे मिलने का अवसर बहुत कम हुआ लेकिन जब सिरपुर मे पहुँच कर उनसे चर्चा की गई तो उनके व्यक्तित्व  एवं कर्म के प्रति समर्पण भाव किसी भी व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है उन्होंने अपनी सेवाकाल का उल्लेख करते हुए बताया कि उनकी अनुकंपा नियुक्ति वर्ष 1999बिरकोनी कष्ठागार मे फील्ड मैन के रूप मे हुई थी तथा वर्ष 2017 मे डिप्टी रेंजर एवं वर्ष 2022मे (परिक्षेत्राधिकारी) परियोजना रीजनल ऑफिसर के रूप मे नियुक्त हुए तथा लगभग सत्ताइस वर्षों के लंबे कार्यकाल मे उन्होंने अनेक वन क्षेत्र जिनमे मुख्यतः कुहरी, छताल, रायकेरा,बार, जैसे अति संवेदनशील क्षेत्रों मे सेकडों लोगों पर अवैध शिकार एवं अतिक्रमण के प्रकरण में वन अधिनियम के तहत कार्यवाही करते हुए एक इतिहास रचा है सिरपुर परिक्षेत्राधिकारी आशीष ख़ुमरी से जब यह पूछा गया क्या ऐसी अपराधिक  प्रकरण मामले मे कार्यवाही करते समय जान माल का खतरा की चिंता नही होती पूछने पर वे आगे बताते है कि सर्वाधिक वन क्षेत्रों मे अतिक्रमण और अवैध शिकार प्रकरण कार्यवाही से हमेशा जान जोखिम रहता है परंतु अपने विभाग के प्रति समर्पित सेवा भाव सर्व प्रथम है यही वजह है कि वन क्षेत्रों एवं वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए हमे तनख्वाह मिलती है जो हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है इसी तारतम्य मे रेंजर खुमरी साहब आगे बताते है कि कोडार डिपो से लगा हुआ ग्राम पिरदा के पीछे स्थित कक्ष क्रमांक 822 मे दो से ढाई एकड़ भूभाग को कतिपय लोगों द्वारा अतिक्रमण कर लिया गया था जहाँ उनके द्वारा मुझ पर प्राण घातक हमला किया गया था हमले मे मेरे माथे और आँख के मध्य गंभीर चोटें आई थी मेरी वर्दी भी फाड़ दिया गया था पुलिस प्रकरण दर्ज होने के पश्चात मै और मेरी टीम ने वहाँ सात दिन सात रात तक लगातार रहते हुए फैसिंग कार्य करवा कर वन क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करवाया इसी प्रकार आरंग रेंज मे पचास हेक्टेयर से 67 हेक्टेयर कुहरी ग्राम छताल मे 35 लोग, 73 प्लस लोगों को रायकेर रेंज मे 23 लोगों पर बार अभ्यारण्य  मे पांच पर अतिक्रमण एवं अवैध शिकार प्रकरण पर कार्यवाही करते हुए पकड़े गए इन समस्त वन अधिनियम के तहत की जाने वाली वैधानिक कार्यवाही की थी परंतु सबसे बड़ी अचरज का विषय बताते चले कि वन विकास निगम द्वारा अवैध शिकार, अतिक्रमण गतिविधियों के रोकथाम के लिए कोई भी सुविधा उपलब्ध नही  है न ही उक्त परिक्षेत्र मे कोई चार पहिया वाहन, न कोई अतिरिक्त उड़न दस्ता की टीम और न ही उचित कार्यालय लगाने के लिए कोई ऑफिस  बनाया गया है इन समस्त अव्यवस्था एवं बगैर संसाधन के अभाव मे उनके द्वारा इतने सारे गंभीर शिकार, अवैध कटाई, ,अतिक्रमणकारी जैसी अपराधिक  कार्यवाही किया जो बहुत ज्यादा प्रशंसनीय है उनके शौर्यवीर साहसिक कार्यों की प्रशंसा वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर वन विभाग के जानकारों द्वारा मुक्त कंठ से की जाती है 

  वे केवल वन विकास निगम के बार परियोजना मंडल के सिरपुर परीक्षेत्र के विकास सुरक्षा उन्नति तक सीमित नही है बल्कि वे जनहित समस्याओं पर भी उनकी पैनी नजर रहती है वन विकास निगम परिक्षेत्राधिकारी आशीष खुमरी बताते है के धंसकुंड जल प्रपात सिरपुर मे कक्ष क्रमांक 175 एवं 176 सर्किल चुरही बीट अमलोर  सिरपुर परक्षेत्र के क्रमशःरोपण वर्ष 2023-2024 मे 16 हेक्टेयर वन भूमि क्षेत्र पर दो मीटर दो के अंतराल मे लगभग चालीस हजार सागौन पौधों का सफल रोपण किया गया था साथ ही कक्ष क्रमांक 175 मे 13 हेक्टेयर मे बत्तीस हजार पांच सौ सागौन पौधों का रोपण किया गया था जो आज लगभग चार से छ फीट से अधिक ऊँचाई पर ग्रोथ कर रहे है सिरपुर रेंजर आशीष खुमरी आगे बताते है कि सागौन पौधों की नियमित सुरक्षा, उपचार देखरेखा की जाती है इसके लिए सुरक्षा श्रमिक तैनात किए गए है यही वजह है कि सभी पौधे स्वस्थ और ग्रोथ कर रहे है तथा सभी शत प्रतिशत स्थिति मे है इसकी वजह उन्होंने यह भी बताया कि सागौन उपचार की प्रथम वर्ष दो बार करते है साथ ही मृत या आपदा ग्रस्त से पीड़ित सागौन मूलतः अलग हो जाते है उनको केज्युवल्टी की जाती है साथ ही मृत या बीमारी की वजह से ग्रोथ न करने वाले पौधों का उपचार निंदाई गूढाई थाला गाला बना कर कीट नाशक खाद से उपचारित किया जाता है जो निर्धारित समय पर लगातार ग्रोथ करते रहते है गाय मवेशी चराई की रोकथाम के लिए ज्यादा से ज्यादा श्रामीको की नियुक्ति की जाती है यही नही बड़े अधिकारी आर जी एम साहब,बार नवा पारा परियोजना मंडल के अनुभवी डी एम साहेब  चन्द्रकांत टीकारिहा जी जो  कार्यों के प्रति अति संवेदन शील  अधिकारी है तथा शत प्रतिशत कार्यों का रिजल्ट देखना चाहते है उनसे लेकर डिप्टी डिविजनल मैनेजर चित्रा त्रिपाठी मैडम  जिनको वानिकी कार्यों का लंबा अनुभव के साथ ही प्लांटेशन के प्रति अति संवेदन शील रहती है तथा वे लगातार समय समय पर मॉनिटरिंग करते रहती है  तथा प्लांटेशन रोपण क्षेत्र मे कमी आने पर दिशा निर्देश दे कर मार्ग दर्शन भी करते रहने की   वजह से प्लांटेशन मे किसी प्रकार की कोताही बरती नही जा सकती और आज वह बहुत अच्छी स्थिति मे बढ़त बनाए हुए है


सिरपुर रेंजर आशीष खुमरी इस बात से व्यथित हो कर बताते है कि संपूर्ण प्लांटेशन कार्य संपादित करने अंदरूनी एवं बाहरी वन ग्राम क्षेत्रों से बहुत से श्रमिकों का आवागमन होता है जहाँ कक्ष क्रमांक 175,176 के समीप धुर्वा गुफा बोरिद  मार्ग है जिसकी लंबाई तकरीबन पांच किलोमीटर जो कक्ष क्रमांक 173 तक है वहाँ के मार्ग मे इतने अधिक गड्ढे और असमतल मार्ग जर्जर अवस्था मे है कि वहाँ आसपास के ग्राम वनवासीयों का चलना एवं अवगमन मे बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है विशेषकर वर्षा ऋतु मे बहुत से ग्रामीण चोटिल हो चुके है फिर भी इस ओर कोई ध्यान नही दिया जाता न वन विभाग, न वन विकास निगम और न ही शासन प्रशासन के जन प्रतिनिधि केवल अश्वासन   से मूलभूत समस्या का निदान किसी ने नही किया है इसकी मूल वजह यह भी बताते है कि वन क्षेत्र तीन जिलों को जोड़ता है एक और बलौदा बाजार जिला दूसरा ओर से महासमुंद जिला एवं तीसरा स्थानीय छ्ताल से अमलोर मार्ग सिरपूर को जोड़ता है उन्होंने यह भी बताया कि इनकी लंबाई क्रमशः दो से पांच और सात किलोमीटर का ही वन मार्ग है तथा वर्ष 2025-2026  सुशासन त्योहार मे  लगातार ग्रामीणों द्वारा अनेक आवेदन दिया  जा चुका है परंतु किसी प्रकार की अब तक कोई सार्थक पहल नही हुई और न ही सड़क निर्माण किया गया कथित वन मार्ग न बन पाने की वजह से वर्षों पुराने वन विकास निगम मे कार्यरत गणेश भोई नामक वन विकास निगम कर्मी ने अत्यधिक व्यथित और क्षुब्ध होकर नौकरी छोड़ दिय उसको अश्वसन देने के बजाए निगम ने ही कार्य वाही कर कार्य से पृथक कर दिया गया वही अनेक गर्भवती महिलाओं का गर्भपात होना भी बताया गया इन सब परिस्थिति का लाभ सभी काष्ठ माफियाओं को मिलता है वे चोरी छुपे कथित क्षेत्र मे सागौन कटाई धड़ल्ले से कर निकाल ले जाते है फिर भी हमारे निगम कर्मचारीयों की तत्परता से तकरीबन पैतीस लोगों पर अवैध कटाई के मामले मे कार्यवाही किया जा चुका है


सिरपुर रेंजर आशीष खुमरी आगे बताते है कि जबकि हमारे परिक्षेत्र मे माता चांदादाई का ऐतिहासिक मंदीर है वही पर धंसकुंड वॉटर फॉल है जो प्राचीन स्थल है तथा  रामणिक पर्यटन स्थल के रूप मे वन विकास निगम द्वारा विकसित किया जा सकता है वहाँ प्रतिदिन सेकडों की संख्या मे उक्त धंसकुंड फॉल एवं चांदादाई मंदिर के दर्शन के लिए आते है एक प्रकार से यह क्षेत्र धार्मिक एवं पर्यटन के रूप मे विकसित कर वन विकास निगम को अतिरिक आर्थिक लाभ का साधन बनाया जा सकता है इस संदर्भ मे बार नवापारा अभ्यारण्य के अधिक्षक श्री कृशानु चंद्राकर से चर्चा करने पर उन्होंने भी इस ओर वन विकास निगम द्वारा पर्यटन स्थल की  सहमति जताई है साथ वन विकास निगम सिरपुर के रेंजर आशीष खुमरी ने यह भी कहा सैकड़ों पर्यटक धंसकुंड फॉल देखने आते है यदि प्रवेश द्वार निर्माण कर टिकट ही लिया जाए तो  निगम को लाखों का राजस्व प्राप्त हो सकता है साथ ही पुरातत्व विभाग कथित क्षेत्र का सर्वे करवाए  तो बहुत सी ऐतिहासिक महत्वपूर्ण अवशेषों का खुलासा भी हो सकता है जहाँ इस ओर वन विभाग सहित अन्य विभाग पर्यटन एवं अभ्यारण्या को बढ़ावा देकर राजस्व मे बढ़ोतरी कर रही है वही वन विकास निगम इस मामले मे काफी पिछडा हुआ  नजर आ रहा है 

मुस्लिम समाज को शिक्षा, कौशल और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर — डॉ. सलीम राज

 मुस्लिम समाज को शिक्षा, कौशल और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर — डॉ. सलीम राज



रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष एवं कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त डॉ. सलीम राज की अध्यक्षता में आयोजित प्रेस वार्ता में मदरसा शिक्षा, नई शिक्षा नीति, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों, मुस्लिम समाज के विकास तथा केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न नीतियों को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। इस अवसर पर उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के चेयरमैन श्री मोहम्मद शादाब शम्स भी उपस्थित रहे।


मीडिया से बातचीत करते हुए डॉ. सलीम राज ने माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और सामाजिक विकास के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाओं का लाभ मुस्लिम समाज सहित सभी पात्र नागरिकों तक पहुँचाना आवश्यक है और मुस्लिम समाज को भी इन अवसरों का अधिक से अधिक लाभ उठाकर आगे बढ़ना चाहिए।


डॉ. सलीम राज ने कहा कि मुस्लिम समाज के बच्चों और युवाओं का भविष्य शिक्षा और कौशल से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता ऐसी शिक्षा व्यवस्था की है, जिसमें दीनी एवं सांस्कृतिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा, कंप्यूटर, विज्ञान, गणित, अंग्रेजी, तकनीकी ज्ञान और रोजगारपरक कौशल भी उपलब्ध हो।


उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के उस विजन का उल्लेख किया जिसमें मदरसे के बच्चे के “एक हाथ में कुरआन और दूसरे हाथ में कंप्यूटर” की बात कही गई है। डॉ. सलीम राज के अनुसार, इसका उद्देश्य मुस्लिम समाज के बच्चों को उनकी परंपरा और संस्कृति से जोड़े रखते हुए आधुनिक ज्ञान एवं तकनीक के अवसर उपलब्ध कराना है।


सरकार की योजनाओं का लाभ मुस्लिम समाज तक पहुँचाने पर जोर


डॉ. सलीम राज ने कहा कि केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं में शिक्षा, कौशल विकास, स्वरोजगार, उद्यमिता, महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और युवाओं के रोजगार से जुड़े अनेक अवसर उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज में इन योजनाओं को लेकर जागरूकता बढ़ाने और पात्र लोगों तक उनका लाभ पहुँचाने के लिए प्रभावी प्रयास आवश्यक हैं।उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज के युवाओं को केवल नौकरी तलाशने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि कौशल, उद्यमिता, तकनीक और स्वरोजगार के माध्यम से आर्थिक रूप से मजबूत बनने की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहिए।  

डॉ. सलीम राज ने विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं और युवतियों की शिक्षा एवं आर्थिक भागीदारी को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि किसी भी समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब उसकी बेटियों और महिलाओं को भी शिक्षा एवं अवसर प्राप्त हों।


उत्तराखंड मॉडल का शादाब शम्स ने दिया हवाला


वहीं उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के चेयरमैन श्री मोहम्मद शादाब शम्स ने मीडिया से बातचीत में उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा से संबंधित किए गए बदलावों और अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए विकसित नई व्यवस्था का हवाला दिया।उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में जो पहल की गई है, उसके अनुभवों पर दूसरे राज्यों में भी विचार किया जा सकता है। उन्होंने शिक्षा को केवल पारंपरिक ढाँचे तक सीमित रखने के बजाय विद्यार्थियों को आधुनिक शिक्षा और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने पर जोर दिया।

छत्तीसगढ़ में संभावित कार्ययोजना पर चर्चा


प्रेस वार्ता के दौरान छत्तीसगढ़ में भी मदरसा शिक्षा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने, अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के लिए बेहतर शैक्षणिक अवसर विकसित करने तथा युवाओं को कौशल एवं रोजगार से जोड़ने की संभावित कार्ययोजना पर चर्चा हुई।डॉ. सलीम राज ने कहा कि छत्तीसगढ़ में मुस्लिम समाज के विद्यार्थियों और युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा, कौशल, तकनीक, रोजगार और उद्यमिता को केंद्र में रखकर काम करने की आवश्यकता है।उन्होंने कहा कि लक्ष्य ऐसा होना चाहिए कि मुस्लिम समाज का बच्चा अपनी दीनी एवं सांस्कृतिक पहचान के साथ आधुनिक भारत की प्रतिस्पर्धा में भी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ सके। वह डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, अधिकारी, उद्यमी या किसी भी आधुनिक क्षेत्र में अपनी पहचान बना सके और देश के विकास में योगदान दे। प्रेस वार्ता में दोनों वक्ताओं ने शिक्षा, विकास, रोजगार, कौशल निर्माण और अल्पसंख्यक समाज को विकास के अवसरों से जोड़ने से जुड़े विभिन्न विषयों पर मीडिया के सवालों के जवाब दिए।डॉ. सलीम राज ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के संकल्प के अनुरूप मुस्लिम समाज के पात्र लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाना और उन्हें शिक्षा एवं विकास के अवसरों से जोड़ना महत्वपूर्ण है।


उन्होंने कहा कि शिक्षा और कौशल ही वह माध्यम हैं, जिनके जरिए मुस्लिम समाज की नई पीढ़ी अपने भविष्य को मजबूत कर सकती है और विकसित भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकती है।

सोमवार, 28 सितंबर 2026

वन विकास निगम अध्यक्ष राम सेवक पैकरा ने मुख्य मंत्री को लाभांश राशि 34.99 लाख का चेक सौपा

 वन विकास निगम अध्यक्ष राम सेवक पैकरा ने मुख्य मंत्री को लाभांश राशि 34.99 लाख का चेक सौपा


रायपुर  ((छ्ग वनोदय पत्रिका) वन विकास निगम के अध्यक्ष राम सेवक पैकरा ने विगत दिवस छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री श्री विष्णु देव साय जी के निवास स्थल मे जाकर वर्ष 2023-24  की लाभांश राशि 34.99 लाख रुपये का चेक सौप कर आत्मीय भेंट की

   इस अवसर पर वन विकास निगम के  अध्यक्ष  राम सेवक पैकरा ने मुख्यमन्त्री विष्णु देव साय को वन विकस निगम के निरंतर किए जा रहे प्रबंधन, प्रयास और कार्य कुशलता, पारदर्षिता, एवं राज्य के वन संसाधनों का समुचित प्रबंधन की दिशा मे किये जा रहे उत्कृष्ट प्रयासों से अवगत करते हुए बताया कि  वन विकास निगम के समस्त कर्मियों का प्रति फल है वन संपदा के संरक्षण संवर्धन के साथ राज्य के  आर्थिक विकास मे योगदान दे कर यह उतरोत्तर विकास प्रगति की मुख्य धारा से जुड़े रहने हेतु संकल्पित रहे है  तथा अपने लक्ष्य प्राप्ति करने की प्रतिबद्धता,के साथ निरंतर अपने  नवीन योजनाओं के विस्तार एवं आर्थिकी सशक्तता के मध्यम की ओर लगातार बढ़ते रहे जो राज्य मे लाभांश राशि देना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है 

   इस विशेष अवसर पर वन विकास निगम के प्रबन्ध संचालक श्री अमरनाथ प्रसाद भावसे कंपनी सचिव विनय मंगल अग्रवाल, सलाहकार सह समन्वयक ए आर पिल्लई सहित वन विकास निगम एवं वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी गण उपस्थित थे यह जानकारी वन विकास निगम के निज सचिव हेमनाथ साहू ने प्रेस विज्ञप्ति के मध्यम से दी

रविवार, 20 सितंबर 2026

रेंजर के खुले भ्रष्टाचार की अग्नि में वन विकास निगम का प्लांटेशन स्वाहा

 रेंजर के खुले भ्रष्टाचार की अग्नि में वन विकास निगम का प्लांटेशन स्वाहा

अलताफ़ हुसैन 

रायपुर (फॉरेस्ट क्राइम न्यूज़) छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम प्रा. लि. द्वारा हरियाली प्रसार करने जैसे महती उद्देश्य एवं कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सी एस आर.)के तहत अनेक औद्योगिक घरानों से मिलकर (आई पी डी) योजना के तहत रिक्त पड़त भाटा ओरेंज भूमि पर भिन्न भिन्न प्रजाति के पौधों का प्लांटेशन कर वातावरण को प्रदूषण मुक्त शुद्ध जलवायु एवं  ऑक्सिजन निर्मित कर आम जन के स्वस्थ्य हित जैसे पुनीत कार्य करता है एवं पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और सरकारी नियमों के साथ तीन से पांच  वर्षों के निर्धारित तिथि पूर्ण होने पर संबंधित उद्योगिक घराने या शहरी ग्रामीण क्षेत्र के परिषद, सरपंच या नगर निगम को  हस्तांतरित कर अपने नैतिक दायित्वों,कर्तव्यों का अनुपालन करते रहा है हस्तांतरण पश्चात उन ग्रामीण जनप्रतिनिधि संस्थान, नगर निगम , नगर परिषद का नैतिक दायित्व बनता है कि वह छ्ग वन विकास निगम द्वारा रोपित प्लांटेशन की कम से कम परिपक्व  अवस्था तक उनकी सुरक्षा व्यवस्था देख रेख समुचित माध्यम से करना अनिवार्य हो जाता है परंतु छ्ग वन विकास निगम द्वारा भिन्न भिन्न प्रजाति के रोपित प्लांटेशन को  नियत तिथि वर्ष के कुछ माह पूर्व यदि आगजनी दुर्घटना वश प्लांटेशन पूर्ण रूपेण समूल नष्ट हो जाता है तब  इसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है ? वन विकास निगम की या स्वीकृत हस्तांतरित लिए गए संस्थान की ? जिसने लाखों की लागत से कराए गए प्लांटेशन को बगैर हरा भरा हरियाली युक्त अवस्था मे लेने के बजाए जली हुई ठूंठ और कोयले की राख जैसी अवस्था मे स्वीकार कर लिया जाए तो इसे क्या कहा जाएगा ? ऐसी दशा मे सीधा सीधा इस ओर यह संकेत मिलता है कि वन विकास निगम मे रेंजर से लेकर उपर बैठे अधिकारी गण की मिलीभगत से लाखों का प्लांटेशन बगैर व्यवस्था सुरक्षा देखरेखा के  हरियाली की जगह उजड़ा चमन बना दिया गया 

               यह प्राकृतिक एवं पर्यावरण प्रेमियों को झकझोर देने वाला एक ऐसा ही सनसनीखेज प्रकरण जिसका प्लांटेशन तो छ्ग राज्य वन विकास निगम  बार नवापारा परियोजना मंडल रायपुर डिविजन द्वारा संपादित किया गया था जो रायपुर से मात्र पच्चीस किलोमीटर अंतरल पर स्थित ग्राम पिरदा भीमोरी मार्ग जिला बेमेतरा के दस हेक्टेयर के पड़त भाटा बंजर भूमि मे वर्ष 2023 को 11,000 भिन्न भिन्न मिश्रित प्रजाति पौधों का प्लांटेशन किया गया था जिसकी रोपित वर्ष,2023 प्लांटेशन से लेकर वर्ष 2025 के माह दिसंबर तक नियमित सुरक्षा केजयुवल्टी, उपचार लगातार की जाती रही थी परंतु यह भी ज्ञात हुआ है कि इन दो वर्षों के बीच भीषण गर्मी मे एकाध बार  अग्नि दुर्घटना  का सामना भी हुआ परंतु चाक चौबंद सुरक्षा चौकीदारों की तत्परता से  भयंकर अग्नि घटना से बचा लिया गया  बताया जाता है कि जब से बिलासपुर से नई रेंजर चंद्रानी बांधे ने चार्ज लिया  है तब से वह विभाग मे भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी है  बार नवा पारा परियोजना मंडल रायपुर परिक्षेत्र का ऐसा कोई क्षेत्र नही जहाँ उसके भ्रष्टाचार की गाथा सुनने नही मिलती हो अब चाहे नवा रायपुर अटल नगर के सेक्टर 36 का वन महोत्सव हो या सेक्टर,16 स्थित पीपल वन क्षेत्र हो या फिर मंत्री बंगले  से लेकर सेक्टर 21 तक राज्य उत्सव  रेलवे स्टेशन क्षेत्र ही क्यों न हो  रेंजर चंद्रानी बांधे द्वारा भ्रटाचार का एक नया इतिहास रच चुकी है जिसमे श्रमिक भुगतान का प्रकरण सबसे अधिक है बताया जाता है कि जिसमे श्रमिकों के खाते मे ऑन लाइन सीधे बैंक अकाउंट मे डाले जाने की व्यवस्था शासन द्वारा की गई  है उसको दर किनार कर उसके द्वारा नगद  भुगतान किया गया वह भी जिसमे कलेक्टर दर की  बजाय दो सौ रुपये से लेकर ढाई सौ तीन सौ रुपये का भुगतान क्यों न  हो यही नही गत वर्ष पथ रोपण सड़क मार्ग के मीडियन क्षेत्र मे संपादित रोपण पश्चात  की जाने वाले निंदाई गूढाई,थाला गाला,केजयुवल्टी, उपचार की नियमित राशि का भुगतान क्यो न हो सभी कार्यों मे उसके द्वारा भ्रष्टाचार का लंबा खेल खेला गया यदि इस ओर सूक्षमता से जांच की जाए तो एक बहुत बड़ा  गड़बड़ झाला सामने आ सकता है परंतु ऐसा करेगा कौन ...सैंय्या भयो कोतवाल....तो अब डर काहे का... जैसी उक्ति को यहाँ चरितार्थ करते हुए मुक्त रूप से भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जा रहा है  उक्त समस्त व्यवस्था की राशि का उपयोग किया ही नही गया और पूरा वर्ष वैसे ही व्यतीत हो गया यहाँ तक  कार्य क्षेत्र मे अनेक श्रमिकों का भुगतान भी विगत तीन से छ माह का अब तक नही दिया गया जिसकी वजह से श्रमिक नगद भुगतान की आशा मे ठेकेदार जो पूर्व मे वन विकास निगम मे या परिचित  व्यक्तियों के मध्यम  से कार्य  संपादित कराए  जा रहे है तथा कार्यों को नियम  अनुसार कलेक्टर दर की बजाएअल्प राशि मे करने विवश कर दिया गया है जिसमे भी ठेकेदार द्वारा अन्य व्यय जैसे  दूरस्थ ग्राम क्षेत्र मे निवासरत श्रमिक ग्रामीणों को कार्य    क्षेत्र  तक लाने ले जाने यानी आवागमन व्यवस्था का हवाला देकर कलेक्टर दर से भुगतान नही की जा रही है बल्कि उन्हे तीन से साढ़े तीन सौ रुपये का भुगतान किया जा रहा है वही     नगद भुगतान करने के बाद ठेकेदार द्वारा कलेक्टर दर के अनुसार बिल प्रस्तुत किया जाता है


जिसका भरपूर लाभ कथित रेंजर चंद्रानी  बांधे द्वारा  उठाया जा रहा है पांच से छ माह तक भुगतान न मिलने वाले श्रमिक का वीडियो साक्ष्य के रूप मे हमारे पास अब भी उपलब्ध है अपनी इसी भ्रष्टाचार वाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वन विकास निगम की परिक्षेत्राधिकारी चंद्रानी बांधे ने ग्राम पिरदा के वर्ष 2023  प्लांटेशन का सत्यानाश कर दिया फॉरेस्ट क्राइम न्यूज़ ने स्थानीय पिरदा ग्रामीणों से जब चर्चा की तो उन्होंने बताया कि पूर्व मे घास खरपतवार के लिए नागर या कटाई जैसी व्यवस्था से उपचार कर लिया जाता था परंतु जब से रेंजर साहिबा आई है उक्त अंतिम वर्ष के निगम द्वारा जारी प्राप्त राशि का उपयोग  कथित प्लांटेशन मे नही किया गया और न ही चौकीदार नियुक्त किया गया परिणामतः ग्राम पिरदा मे वर्ष 2026 प्रारंभ  होते ही  जनवरी फरवरी मार्च के मध्य प्लांटेशन क्षेत्र मे विकराल अग्नि कांड हो गया जिसमे संपूर्ण प्लांटेशन जल कर स्वाहा हो गया जबकि यह भी ज्ञात हुआ है कि वर्ष 2026 अप्रेल से जून के मध्य पिरदा सरपंच को प्लांटेशन हस्तांतरित करना था जो उन्हें जून में कर दिया गया अब सवाल उठता है जब अंतिम वर्ष वन विकास निगम द्वारा जारी राशि  इसी सुरक्षा व्यवस्था कार्यों मे लगता है तब उन शेष राशि को परिक्षेत्राधिकारी द्वारा उपयोग कर क्यों नही लगा कर प्लांटेशन को बचाया गया?


 इससे स्पष्ट होता है कि संपूर्ण राशि रेंजर द्वारा पूरी तरह गबन कर लिया गया जबकि पूछताछ मे ग्रामीणों ने यह भी बताया कि इसकी शिकायत ग्राम पिरदा के सरपंच (संजू) संजीव परगनिहा द्वारा वन विकास निगम बार नवा पारा परियोजना मंडल के अधिकारयों को प्लांटेशन के जलने की लिखित मे की गई थी तथा इसकी जांच का जिम्मा एस डी ओ द्वारा किया गया था अब कौन से अधिकारी ने इसकी क्या जांच कर क्या  जवाब दिया गया यह तो ज्ञात नही चल पाया है परंतु लाखों रुपये का हरियर छत्तीसगढ़ के तहत प्लांटेशन किया गया था जो पूरी तरह अब जल कर स्वाहा हो गया यहाँ तक अब फैनसिंग, लगने वाले सीमेंट पोल भी निकाल कर ध्वस्त कर दिया गया गाय गरुआ मुक्त रूप से प्लांटेशन मे चराई करते देखे जा सकते है  ऐसी स्थिति मे जले ठूंठ से निकलने वाली नए  कोपल की संभावना भी क्षीण हो जाती है इस संदर्भ मे हमने पंचायत सरपंच से मिलने का प्रयास किया था वे हमे उपलब्ध नही हुए वही बार नवापारा परियोजना मंडल के डी एम. टिकरिहा जी से संपर्क कर वस्तुस्थिति ज्ञात करने देवेंद्र नगर स्थित कार्यालय भी पहुंचे थे परंतु वे भी बिलासपुर प्रवास मे थे अब सवाल उठता है हस्तांतरण होने के दो चार माह पूर्व हुए कथित अग्नि कांड जिसमे  लाखों का मिश्रित प्रजाति का पिरदा स्थित प्लांटेशन किया गया था उसकी भरपाई अब कौन करेगा ?

जबकि स्थानीय पिरदा ग्रामीणों ने यह भी कहा है कि नशा करने वाले असमाजिक तत्वों द्वारा सूखे घास मे बीड़ी सीगरेट फेक कर आग लगाई गई और लाखों रुपये का प्लांटेशन मे घनघोरअग्नि कांड से सब कुछ स्वाहा हो गया यदि जिम्मेदार परिक्षेत्राधिकारी चंद्रानी बांदे समय रहते सुरक्षा कर्मियों की नियुक्ति, घास फूस खरपतवार की कटाई की गई होती तो इतना बड़ा जघन्य अग्नि कांड नही होता और पिरदा सरपंच को (हैंड वर्क) हस्तांतरण तिथि मार्च से मई जून के मध्य तक इसे बचाया जा सकता था 

मंगलवार, 15 सितंबर 2026

वन,पर्यटन,एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण संवर्धन मे जन भागीदारी बढ़ी- केदार कश्यप

 वन,पर्यटन,एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण संवर्धन मे जन भागीदारी बढ़ी- केदार कश्यप

अलताफ़ हुसैन

रायपुर(छत्तीसगढ़ वनोदय) छ्ग वन विभाग लगातार वन एवं वन्य प्राणियों की सुरक्षा विलुप्त होती भिन्न भिन्न प्रजाति के पेड़,पौधे, सूक्ष्म जीव जंतु, जैसी जैव विविधता के संतुलन के लिए लगातार बेहतर प्रयास कर वनवासी वनआदिवासीयों के समृद्धशाली संस्कृति विरासत, रोजगार मूलक व्यवस्थाओं की चिन्ता करते हुए  वनों मे स्थित प्राकृतिक क्षेत्रों मे पर्यटन के अवसर तलाश करते   भिन्न भिन्न योजना बद्ध तरीके से उनका चयन एवं चिन्हाकित कर   वनों के संरक्षण संवर्धन हेतु वन विभाग दृढ़ संकल्पित है इसके लिए छत्तीसगढ़ वन विभाग बहुत से वन क्षेत्रों मे योजनाओं एवं उसके सफलता पूर्वक


क्रियान्वयन के साथ बढ़ती आबादी घटते वन के आंशिक क्षेत्रों के रकबा मे  बढ़ोतरी हुई है बल्कि  लगातार बढ़ रहे ग्लोबल वार्मिंग के साथ परिवर्तित जलवायु परिवर्तन जैसी मूल धारणा पर भी शिकंजा कसने मे लगभग   सफलता प्राप्त हुआ है जिसका मुख्य कारण जन  भागीदारी के साथ विभाग द्वारा वृक्षारोपण वानिकी कार्य एवं एक पेड़ मां के नाम जैसी सफल योजनाओं के मध्यम से एक ऐतिहासिक लक्ष्य की ओर अग्रसर है जो विभाग के लिए बहुत बढ़ी उपलब्धि है 


उक्तशय की जानकरी छत्तीसगढ़ प्रदेश के  वन मंत्री केदार कश्यप ने  प्रेस वार्ता में यह बात कही उन्होंने आगे बताया कि छत्तीसगढ़ प्रदेश के वन क्षेत्रों का एक समृद्ध शाली इतिहास रहा है जिसके संरक्षण संवर्धन एवं  विस्तृत विरासत को सहज कर अक्षुषय बनाए रखने की दिशा मे  नवीन योजनाओं के मध्यम से विभाग लगातार कार्य कर रहा है इसी कड़ी मे विगत तीन वर्षों से एक पेड़ मां के नाम जैसी देश के यशस्वी प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी के  अह्वान पर  जन भागीदारी के तहत प्रत्येक व्यक्ति को मां जैसी भावनात्मक स्मृति को संजोने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय जी के प्रेरणा दायी योजना का जन भागीदारी के तहत पौधे वितरण जैसी बहु उद्देशीय कार्य जारी है जिसमे वर्षानुसर वर्ष 2024 मे 2.50 करोड़ पौधों के वितरण के  लक्ष्य के साथ एक करोड़ अधिक अर्थात साढ़े तीन करोड़ पौधों का जो 140℅ उपलब्धि प्राप्त किया गया उसी प्रकार वर्ष 2025 मे 1.65 करोड़ पौधे वितरण से अधिक 3.50जो लक्ष्य से 1.90 करोड़ अधिक के साथ 215 ℅ अधिक रहा उसी प्रकार जारी वित्तीय वर्ष 2026 मे 2.73 करोड़ पौधों का वितरण 2 करोड़ 23 लाख 65 हजार पौधों का रोपण एवं वितरण अभियान जारी है जो भविष्य मे इससे अधिक का लक्ष्य प्राप्ति किया जाएगा ऐसी आशा छ्ग के वन मंत्री  ने व्यक्त की है वन मंत्री श्री केदार कश्यप ने आगे बताया कि नवा रायपुर अटल नगर मे शहरी वृक्षारोपण के तहत नवागांव तूता क्षेत्र मे लगभग 80.080 हेक्टेयर भूभाग के वर्ष 2024 मे एक पेड़ मां के नाम योजना का प्रारंभ किया गया था जहाँ लगभग बीस  हजार मिश्रित प्रजाति के पौधे रोपे गए थे जिसमे  मुख्यतः नीम, आंवला, बेहड़ा, सागौन, बीजा, साजा, बांस, जैसी इमारती काष्ठ सहित औषधि गुण वाले पौधे विकसित किए गए है जो आज वृक्ष का स्वरूप मे आकार ले रहे है यहाँ आज भी पाइप लाइन बिछा कर आधुनिक तकनीक ड्रिप पद्धति से सिंचाई कर सुरक्षा देख रेख  एवं उपचार की जा रही है जो पर्यावरण सुरक्षा का सजीव उदाहरण माना जा रहा है उन्होंने आगे बताया कि प्रदेश की गोद मे विकसित प्राकृतिक आभा एवं 

नैसर्गिक पर्यावरणीय छटा को संरक्षित करने की उद्देश्य से अनेक पर्यटन स्थल का उन्नयन करने छत्तीसगढ़  सरकार पूर्ण रूप से कटिबद्ध है इस दिशा मे पूरे राज्य मे लगभग 240 प्राकृतिक पर्यटन स्थल विकसित किए गए है जिनमे पचास से अधिक स्व सहायता समूह द्वारा वन क्षेत्रों के पर्यटन का संचालन किया जा रहा है जिससे वन क्षेत्र के वन वासी एवं वन आदि वासियों  के वन समितियों को रोजगार, एवं आय का सशक्त मध्यम बन चुका है  इनमे बुका, सतरेंगा, कोडार, टाटामारी, एवं घुड़माराम, जैसे इको टूरिजम प्रमुख है इनके अलावा बस्तर लोमनी पार्क सरगुजा संजय वाटिका, कटघोरा बुका विहार, महासमुंद मे कोडार कैंप जलाशय धमतरी सत्कार सरोवर, कांकेर मे दुधावा,सरगुजा मे जलजली, सरगुजा रामगढ़, नारायण पुर इको पार्क वन मन्दिर, मनेंद्र गढ़ स्थित गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क जैसे वन क्षेत्रों मे नैसर्गिक वन पर्यटन क्षेत्रों का लगभग प्रस्तावित लक्ष्य दो करोड़ साठ लाख एवं सकल आय दो करोड़ इक्कीस लाख माना गया है जो विकास के साथ ही आदिवासी वर्ग की विरासत भी मानी जा रही है उन्होंने पर्यटन की  विकसित सड़क मार्ग उन्नयन की दिशा के  संदर्भ मे आगे बताया कि  कवर्धा सफारी मॉडल मे 35 किलोमीटर लंबा नया सफारी मार्ग विकसित किया गया चक्रीय निधि से 4×4 सफारी वाहन का संचालन भी किया जा रहा है वही रायपुर से चालीस किलोमीटर के अंतराल स्थित मोहरेंगा प्राकृतिक वन दर्शन केंद्र मे जल  संरक्षण,वन जीव संरक्षण, मार्ग संरचनाओं के विकास के साथ ही , प्राकृतिक भ्रमण, एवं समृद्ध जैव विविधता पर्या वरण शिक्षा का केंद्र बिंदु बनता जा रहा है यहाँ दो सर्व सुविधा युक्त आकर्षक कॉटेज का निर्माण किया गया है जो शहर के भीड़ भाड़ प्रदूषण मुक्त एवं स्वच्छ वातावरण मे परिवारिक माहौल को खुशनुमा बनाता है जो प्रकृति प्रेम और वन संरक्षण के प्रति जन जागरुकता बढ़ाने का सशक्त मध्यम बन रहा है वन मंत्री केदार कश्यप ने पर्यटन के बारे मे आगे जानकारी देते हुए बताया ठेमली आईलैंड धमतरी का यह पर्यटन बहुत अधिक आकर्षक का केंद्र बिंदु है गंगरेल बांध के शांत वातावरण जल के बीच ठेमरी आईलैंड को इको पर्यटन के रूप मे विकसित किया गया है जहाँ प्रकृति संरक्षण के साथ इको फ्रेडली  विकास के साथ औषधीय पौधों का संरक्षण एवं स्थानीय रोजगार के अवसर मिल रहा है इसके अलावा बिलासा ताल वसुंधरा उद्यान बिलासपुर मे प्राकृतिक सौंदर्य और रचनात्मक विकास के कारण पर्यटकों के लिए आकर्षक बन चुका है यहाँ पारंपरिक चित्रकारी से सजे रंग बिरंगे पुल, जलाशय के समीप आकर्षक हट, और कलात्मक इको फ्रेंडली मार्ग बच्चों के लिए जुरासिक थीम पर डायनासोर जोन सबको अपनी ओर आकर्षित करता है वन मंडल बिलासपुर के कोटा परिक्षेत्र मे वन चेतना केंद्र पटैत के तहत घोंघा जलाशय मे कॉटेज कैंटीन का निर्माण किया गया जहाँ नौका विहार, कयाकिंग जैसी एंडवांचर गतिविधियां संचालित होती है जो लोगों को खूब आकर्षित कर रही है आसपास क्षेत्र मे नजर डाली जाए तो उन्होंने महासमुंद वन मंडल के अंतर्गत जिले के सरायपाली शिशुपाल इको ट्रेल बुढ़ा डोंगर ऐतिहासिक धरोहर साहसिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बनकर बड़ी तेजी से उभरा है पैतालिस लाख रुपये की लागत से कथित इको ट्रेल पर अब तक बाईस हजार से उपर पर्यटक भ्रमण कर चुके है जिसमे अब तक चार लाख बियालिस हजार का शुद्ध आय प्राप्त हुआ है परियोजना के मध्यम से 832 मानव दिवस का रोजगार सृजन हुआ है 15 स्थानीय लोगों को नियमित आजीविका प्राप्त हुई है यहाँ कैन्पिग, नेचर ट्रेल, ट्रैकिंग तीन मीटर ऊँचा घोड़ाधार जल प्रपात तथा प्राचीन दुर्ग, मंदिरों के अवशेष क्षेत्र को प्रकृति और ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाता है

 

 बस्तर क्षेत्र मे प्रगति विकास के नए आयाम स्थापित किये जा रहे इस संदर्भ मे वन मंत्री ने बताया की बस्तर सदैव प्रकृति एवं पर्यावरण के साथ आदिवासी परंपरा का केंद्र बना रहा है जिनकी विरासत को सहेजने के उद्देश्य से  अनेक स्थल का विकास किया गया जिनमे मुख्यतः जन जातीय वाटिका जगदलपुर, डंपिंग ग्राउंड से प्रकृति के आंगन तक,जैसे क्षेत्रों की हरियाली और जैव विविधता पर संरक्षण कर विशेष ध्यान दिया गया एवं पर्यटन के रूप मे विकसित किया गया वही बस्तर जिले के धुड़माराम गाँव अपनी समृद्ध धुर्वा आदिवासी संस्कृति पारंपरिक जीवन शैली, और प्राकृतिक परिवेश के साथ छ्ग के प्रमुख ग्रामीण एवं एको पर्यटन के रूप मे पहचान बना लिया है जहाँ चालीस परिवार और दो सौ पंद्रह लोगो की आबादी निवास करती है यहाँ पर्यटकों को उनके बीच पहुँच का धुर्वा संस्कृति व्याख्या, हस्तशिल्प कला, आदिवासी रहन सहन, एवं पर्यटन विरासत का सीधा साक्षातकार संवाद का अवसर प्राप्त होता है


वन मंत्री ने आगे बताया कि इसके अलावा ढोलकल गणेश ट्रैकिंग का शुभारंभ, तुंगल डैम, जहाँ नक्सल प्रभावित महिलाओं के रोजगार सृजन का मध्यम बना हुआ है वही वन मंदिर, दंतेवाड़ा टेकनार रोड  विश्व धारोहर कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, को भी पर्यटन के रूप मे विकसित ख्याति प्राप्ति हुई है उन्होंने वन्य प्राणियों की संरक्षण की दिशा मे बाघों की संख्या मे निरंतर वृद्धि देखी जा रही है होना बताया जिसकी वर्ष 2022 मे 18 बाघ थे जो वर्ष 2026 में इनकी संख्या 35 पहुँच गई है जो अच्छे संकेत माना जा रहा है बार नवापारा अभ्यारण्य मे 77 काले हिरण का पुनर्वास किया गया था जिनकी वर्तमान  संख्या लगभग 200 के करीब पहुँच चुकी है जो वन विभाग द्वारा वन्य प्राणियों की सुरक्षा पूर्ण प्रतिबद्धता, उनके संरक्षण संवर्धन के संकल्प को दोहराता है  बार अभ्यारण्य मे लगातार बढ़ रही काले हिरण की संख्या की प्रशंसा देश के यशस्वी प्रधान मंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने अपने मन की बात कार्यक्रम मे भी की थी वन्य प्राणी जो छत्तीसगढ़ राज्य की धरोहर मानी जाती है उनके संरक्षण एवं पुनर्स्थापन हेतु विशेष प्रयास किए जा रहे है जिनमे राजकीय पशु वन भैंसा, राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना, प्रमुख है हाथियों के संरक्षण के लिए जन जागरुकता सामुदायिक भागीदारी और आधुनिक तकनीक से गजसंकेत एवं गज रथ यात्रा के मध्यम से लोगों मे अभियान चलाया जा रहा है गज एप के मध्यम से हाथियों की विचरण, गतिविधियों की जानकारी मोबाइल से प्राप्त कर समय पर चेतावनी पहुंचाई जाती है ताकि प्रभावित होने वाले ग्राम क्षेत्र के ग्रामीण सतर्क रह सके और किसी भी प्रकार की जान माल की क्षति को बचाया जा सके वन मंत्री केदार कध्याप ने बताया मानव हाथी द्वंद मे काफी गिरावट देखी जा रही है वर्ष 2022 मे जहां 76 जन हानि हुई थी  उसकी तुलना मे वर्ष 2026 मे यह घटते हुए मात्र 53 हो गई जो वन विभाग के लिए बहुत बढ़ी उपलब्धि है 

रविवार, 30 अगस्त 2026

वन विभाग की अभनपुर आरामिल मे पकड़ी गई करोड़ों सराई (साल) काष्ठ की कार्यवाही मे बड़ा खेल का अंदेशा

 वन विभाग की अभनपुर आरामिल मे  पकड़ी गई करोड़ों सराई (साल) काष्ठ की कार्यवाही मे बड़ा खेल का अंदेशा 

अल्ताफ हुसैन

रायपुर (फॉरेस्ट क्राइम न्यूज़)राजधानी रायपुर का सर्वाधिक अति संवेदनशील  वन मण्डल कार्यालय क्षेत्र जहाँ  कार्य प्रणाली व्यवस्था मे तनिक गफलत हुई नही की विभागीय कार्यों का डंडा चलने का भय सभी अधिकारी कर्मचरियों पर सदैव बना रहता है उस की चपेट मे परिक्षेत्राधिकारी से लेकर मैदानी अमले के कर्मचरियों पर ऐसी विभागीय कार्यवाही की  दो धारी तलवार लटकी रहती है कि जरा सी लिखा पढ़ी में ऊँच नीच की जुम्बिश हुई नही कि उन पर डंडा चलना लाजिमी है फिर भी मैदानी कर्मचारी रात दिन मेहनत कर प्लांटेशन से लेकर अन्य संपादित कार्य शत प्रतिशत करने के साथ ही विभागीय मैनेजमेंट तथा राजधानी के राजनैतिक, तीज त्योहार, पर्व धार्मिक व्यवस्था के साथ अनेक समावेशी व्यवस्थाओं का भार उपने सिर लेकर कई गुना मन वजन बढ़ा लेते है जिसकी वजह से बहुत से अधिकारी विशेष कर रायपुर वन मण्डल कार्य क्षेत्र से पलायन करने बाध्य रहते है उस पर वरिष्ठ अधिकारियों का आर्थिकी मैनेजमेंट का तांडव उन पर अलग बना रहता है  इस संदर्भ में कुछ चर्चित विभागीय कार्यों का नजदीकी से समीक्षात्मक, अवलोकन किया तो  पाया कि कुछ माह पूर्व कोरबा से कथित सरई (साल गोल्डन काष्ठ) काष्ठों की स्थानीय रायपुर डिविजन एवं कोरबा डिविजन के संयुक्त टीम द्वारा अभनपुर मिल के व्यवस्थापक द्वारा करोड़ों की प्रतिबंधित काष्ठ को कौड़ियों के दाम दो से दस रुपये प्रति किलों की दर मे कई टन माल का अवैध रूप से क्रय कर लिया गया था जिस पर रायपुर उड़न दस्ता द्वारा अभनपुर स्थित शर्मा सॉ आरामिल संचालक ममन चंद शर्मा के विरुद्ध बड़ी कार्यवाही करते हुए वन मंडल रायपुर के उड़न दस्ता, एवं कोरबा वन मंडल के वन कर्मियों की उपस्थिति में क्रेता विक्रेता दोनों के उपर वन अधिनियम के  विभिन्न धाराओं के तहत मामला पंजीबद्ध कर कार्यवाही किया गया था


जिसमे यह बताया गया था कि दो ट्रक सेकडों वर्ष पुराने सरई (साल)इमारती कष्ठों का वन मंडल कोरबा के वन कर्मियों द्वारा राजसात कर कोरबा ले जाना बताया गया फिर ऐसी क्या वजह हुई कि कुछ सप्ताह मे ही सी सी एफ रायपुर द्वारा पुनः जांच प्रक्रिया करवाई गई  जो अब तक जारी है उक्त पुनःरिक्षण जांच की चर्चा आम जन, और विभागीय वन कर्मी के मध्य बहुत जोरों शोर से हो रही है उक्त सी सी एफ द्वारा दुबारा जांच कार्यवाही को लेकर अनेक  क्यास निकाले जा रहे है इस संदर्भ मे यह भी खबर उड़ रही थी  कि रायपुर उड़न दस्ता टीम के द्वारा अभनपुर का अति चर्चित आरामिल जांच कार्यवाही को लेकर कुछ अधिकारियों पर उनके संदेहास्पद कार्य शैली को लेकर शंका व्यक्त की जा रही थी इसकी सत्यता ज्ञात करने के उद्देश्य से  आरा मिल जाकर पुनः जांच की गई साथ ही यह भी चर्चा है कि कुछ अधिकारियों की टीम द्वारा कुछ अधिकारी से पूछताछ की गई थी अब इसमें कितनी सत्यता है इसकी पुष्टि फॉरेस्ट क्राइम न्यूज़ नही करता है परंतु  सीसीएफ स्तर पर अभनपुर आरा मिल मे कथित कोरबा से तस्करी कर  लाई गई सराई (साल) काष्ठ पर रायपुर वन मण्डल उड़न दस्ता द्वारा की जा चुकी कार्यवाही होने के बाद यह पुनः जांच प्रक्रिया क्यों और किस वजह से की गई वह अनेक संदेह और सवालों को खड़ा करता है एक वजह यह भी बताया जाता है कि राजनैतिक दबाव की वजह से दोबारा अभनपुर आरामिल मे ऐसी कार्यवाही की गई जिसकी पूरी चर्चा  विभाग और बाहर होने लगी लोग सवाल उठाने लगे की जब उच्च स्तरीय कार्यवाही करना ही था तब दोबारा जांच क्यों ? इस संदर्भ मे अंदर  खाने मे इस बात की चर्चा भी बड़े जोरों से गर्म है कि कोरबा वन मण्डल द्वारा दो ट्रक सरई काष्ठ राज सात कर ले जाया गया था परंतु सीसीएफ टीम के सघन जांच मे अभनपुर के शर्मा  सॉ आरा मिल मे उतनी ही सरई (साल) इमारती काष्ठ पुनः पाई गई है जिसकी कीमत भी करोड़ों रुपए आंकी जा रही है क्योंकि यह सराइ(साल) काष्ठ भी उसी का हिस्सा माना जा रहा है जिसे जप्त कर राजसात कर कोरबा ले जाया जा चुका है ? अब सवाल खड़ा होता है कि  जब संपूर्ण कार्यवाही होने के बाद सरई (साल)काष्ठ राजसात कर मूल कोरबा पहुंचाया जा चुका है तब रायपुर वन मंडल के अभनपुर स्थित शर्मा सॉ आरा मिल मे सराइ (साल) का दो ट्रक से अधिक काष्ठ  किसका है ?


ज्ञात करने जब अभनपुर जा कर इसकी पतासाजी की गई तो ज्ञात हुआ कि वहां सीसीएफ वन कर्मी टीम द्वारा पुनः रिक्षण से प्राप्त सरई (साल) काष्ठ किसी भी वन मण्डल से टी. पी. अथवा जारी वैध दस्तावेज प्राप्त नही हुआ जो कई सवालों को खड़ा करता है कि जब यहां प्राप्त सरई (साल) का दस्तावेज यहां नही तो कोरबा ले जाया गया सरई  साल किसका ? और यदि उसका दस्तावेज सही तो अभनपुर शर्मा सॉ मिल मे वर्तमान मिले सरई साल का दस्तावेज किस वन मंडल से क्रय कर लाया गया वह भी शर्मा सॉ मील मे यहां नही मिला  दोनों स्थिति मे वन कर्मियों एवं सॉ मील मालिक की कार्य शैली पर संदेह और बढ़ जाता है हालांकि कोरबा से सरई (साल) काष्ठ लाने वाले  ठेकेदार ने किस युक्ति से बगैर नीलाम काष्ठागार या विभागीय लिखा पढ़ी दस्तावेज के बगैर से फर्जी टी पी चालान के मध्यम से रायपुर अभनपुर सॉ मिल लाकर परिवहन किया गया था वह तो वन विभाग की टीम द्वारा कार्यवाही कर उतना काष्ठ वापस कोरबा ले गई अब यहाँ सीसीएफ टीम ने पुनः रिक्षण कर उतना ही मात्रा से अधिक काष्ठ का पाया जाना वह दोनों रायपुर, कोरबा वन मंडल वन कर्मियों को शक और कार्यवाही के कटघरे मे ला कर खड़े कर दिया है  यहाँ तक सरई (साल) काष्ठ लाकर तस्करी करने वाले व्यक्ति मिल मालिक का  फंसना तो तय है लेकिन दोनों वन मंडल कार्यालय के वन कर्मियों पर भी विभागीय कार्यवाही, निलंबन की तलवार  लटकी हुई है जबकि इस संदर्भ मे कोई शक-ओ- शुबह  नही कि रायपुर वन मण्डल के उड़न दस्ता टीम ने रात दिन एक कर के इंच घन मीटर नाप जोख उच्च अधिकारीयों के मार्ग दर्शन मे वन अधिनियम के तहत तत्कालिक सराइ (साल) कष्ठों पर त्वरित कार्यवाही कर प्रशंसा अर्जित की है इसके पूर्व भी खैर प्रकरण की अगुवाई कर वाह वाही बटोरी है परंतु उनकी गलती यह है कि वे कोरबा सरई साल काष्ठ की कार्यवाही के समय पूरे मिल का बारीकी से निरीक्षण न करते हुए केवल लाए गए कष्ठों की तरजीह दी तथा अन्य कष्ठों पर ध्यान नही दिया वही कोरबा वन मंडल के वन कर्मियों के बीच से कथित ठेकेदार द्वारा इतने टोल नाका सब को पार कर राजधानी रायपुर तक काष्ठ कैसे पहुंच गया वह भी फर्जी टी पी, बगैर विभागीय दस्तावेज, और चालान के माध्यम से जो बगैर किसी वन कर्मी के मिली भगत के असंभव है रायपुर सीसीएफ ऑफिस टीम द्वारा पुनःरिक्षण अभनपुर आरा मिल परिसर के क्षेत्र मे इतनी बड़ी मात्रा मे सराई (साल) काष्ठ का मिलना अचंभित और हैरान करने वाली बात है 



बहुत से स्थानीय आरा सॉ मिलार्स से चर्चा करने पर यह बात छन का सामने आ रही है कि जिस प्रकार बड़ी मात्रा मे सरई साल काष्ठ सहित अन्य प्रजाति के इमारती कष्ठों का बगैर दस्तावेज के जखीरा बरामद हुआ है उससे यह बात स्पष्ट है कि आरामिल तो बंद होना तय है साथ ही उसका लाइसेंस भी रद्द होना तय  माना जा रहा है   जबकि  कुछ वन अधिनियम कानूनी विद जानकार यह भी कहते है कि अभनपुर वन मालिक द्वारा कुछ किलोमीटर की दूरी पर अमोरा  स्थित क्षेत्र के स्वयं के निजी भूमि मे आरामिल का लाइसेंस नए नाम पता के साथ स्थानांतरण करवा सकता है वह भी उस स्थिति मे जब हाल ही पकड़े गए काष्ठ मूल्यांकन का शासकीय दर से फाइन अदा करने के बाद वह भी सीसीएफ द्वारा उच्च स्तरीय जांच पर यदि चाहे तभी संभव हो सकता है नही तो रायपुर कोरबा वन कर्मियों पर कार्यवाही तो होगी ही साथ मिल मालिक को लंबी जेल यात्रा भी तय है यह भी चर्चा है कि मिल मालिक नाम मात्र काष्ठ छोड़ कर रात्रि में वह बेशकीमती काष्ठ का परीवहन गुपचुप तरीके से पिछले दरवाजे से कर सकता है तथा विभागीय कार्यों को भी प्रभावित कर सकता है जिस पर विभाग पैनी नज़र या एक सिपाही उसकी सुरक्षा मे रात दिन नियुक्त कर निगरानी बनाए रखना आवश्यक है परंतु विभाग केवल जांच की आंच मे वन कर्मियों को उलझा चुका है जबकि रायपुर उड़न दस्ता टीम ने आरा मिल के मशीन को वन अधिनियम के अनुसार विभागीय सील लगाकर  लॉक कर दिया गया जो अनेक कही अनकही  सवालों के जवाब गर्त में अब भी छुपा हुआ है अब देखना यह है कि भविष्य मे अभनपुर आरा मिल के इस बहुचर्चित सरई (साल) प्रकरण मे ओर क्या कार्यवाही होती है सब के सिर पर  तलवार लटकी हुई उसकी जद मे अब वन मंडल   के विभागीय वन कर्मी आते है या फिर मिल मालिक यह देखना होगा ? 

शनिवार, 22 अगस्त 2026

अनुठी पहल वन विभाग के दैनिक वेतन भोगियों के आश्रित परिवार को देगा एक लाख रुपया अनुकम्पा अनुदान

 

अनुठी पहल
वन विभाग के दैनिक वेतन भोगियों के आश्रित परिवार को देगा एक लाख रुपया अनुकम्पा अनुदान



रायपुर/ (फॉरेस्ट क्राइम न्यूज़) छत्तीसगढ़ में वर्तमान में भिन्न भिन्न संगठन कार्य कर रहे है लेकिन दैनिक वेतन भोगी वन कर्मचारी संघ ने वन विभाग में कार्यरत   कर्मचारियों के हित में कुछ अलग ही पहचान निर्मित की है, छत्तीसगढ़ दैनिक वेतनभोगी वन कर्मचारी संघ पं.क्र.548 लगातार दैनिक वेतनभोगी भोगी कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा का मुद्दा विगत दस वर्षों से निरंतर उठाते आ रहे है!

यह जानकारी देते हुए  संगठन के महामंत्री राजकुमार चौहान  ने  बताया कि छत्तीसगढ़ में यह पहला ऐसा निर्भीक संगठन देखने को मिला जो अपने विशिष्ट कार्यशैली,दृढ़ मजबुत इरादे के साथ संघर्षरत है, वर्ष 2018 में लगातार 22 दिनों तक वर्ष 2022 में लगातार 34 दिनों तक वही वर्ष 2024 में 48 दिनों तक लगातार अनिश्चित कालीन हड़ताल में रहकर  दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी, वाहन चालक,कम्प्युटर आपरेटर,  डाटा एन्ट्री आपरेटर, कार्यालय सहायक, तेन्दुपत्ता गोदाम सुरक्षा श्रमिको के लिए मुद्दा उठाया! जिसके लिए आज भी निरंतर संधर्ष जारी है

वर्ष 2018 अनिश्चित कालीन हड़ताल में सफलता :- छत्तीसगढ़ में वर्ष 2008 में नियमितीकरण के बाद किसी भी विभाग में दैनिक वेतन भोगी नही माना जाता था और ना ही दैनिक श्रमिक शासन को विभाग के द्वारा निरंक भेजा जाता था,किन्तु छत्तीसगढ़ दैनिक वेतनभोगी वन कर्मचारी संघ ने इस मुद्दा को लेकर रणनीति के तहत लड़ाई लड़कर दैनिक वेतनभोगी मनवाते हुए पहली बार वृत्त स्तर से वरीयता सूची बना!

वर्ष 2022 की अनिश्चित कालीन हड़ताल की सफलता :- संगठन ने पुन : छत्तीसगढ़ दैनिक वेतनभोगी वन कर्मचारी संघ पं.क्र.548 के बैनर तले वर्ष 2022 में 34 दिनों तक अनिश्चित कालीन हड़ताल किया ,

1. उक्त हड़ताल के परिणाम स्वरूप श्रमायुक्त दर पर कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कुशल,अर्धकुशल, अकुशल श्रमिकों को 4,000 रूपया श्रम सम्मान राशि पारितोषिक भुगतान जारी किया गया.


2. दैनिक वेतन भोगी के निधन हो जाने पर उनके आश्रित पीड़ित परिवार के सदस्य को एकमुश्त 01 लाख रूपया अनुकम्पा अनुदान राशि, का भुगतान जारी करवाया जो संघ की बहुत बड़ी उपलब्धि है!


3. हड़ताली दैनिक वेतन भोगियों को 34 दिन हड़ताल अवधि का वेतन भुगतान आदेश जारी!


4. हड़ताली कर्मचारियों के पुन: वापसी सेवामुक्त किये गये कर्मियों की बहाली!


5. दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों का नियमितीकरण का प्रस्ताव शासन को भेजा गया!


वर्ष 2024 की अनिश्चित कालीन हड़ताल के परिणाम :- छत्तीसगढ़ दैनिक वेतनभोगी वन कर्मचारी संघ ने अपनी  लंबित मांगों को लेकर पुन: मैदान में कुदा जिसके परिणाम स्वरूप निम्न मांगे पुरी की गई :-

1. वन विभाग में कुछ वन मंडलों में 24 घंटा ड्युटी लिया जा रहा था जिसे तत्काल बंद कर शासन के नियमानुसार 08 घंटा ड्युटी लिये जाने का निर्देश जारी हुआ!


2. दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों जिनकी सेवा अवधि 02 वर्ष पूर्ण हो गया है उनका स्थायीकरण करने हेतु प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा गया है।


3. कार्यभारित तथा आकस्मिकता निधि सेवा नियम लागु किये जाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया।


4. वन विभाग में 129 दैनिक वेतनभोगी को कार्य से पृथक किया गया उनकी पुन: वापसी !


5. श्रम सम्मान राशि से वंचितों को श्रम सम्मान देने के लिए जारी हुए निर्देश!


6. हड़ताली कर्मचारियों को हड़ताल अवधि का वेतन भुगतान!


सहित कई ऐसे मुद्दे है जिन्हे सकरात्मक पहल से अधिकारियों से समन्वय बनाकर सफलता हासिल किया गया है।

संगठन के महामंत्री राजकुमार चौहान ने बताया कि
वन विभाग के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी एवं श्रमिक अपने संगठन के प्रति समर्पित है जिसके कारण संगठन पूरी निष्ठा और मजबुती के साथ अपना पक्ष रखता है और पहल भी होता है।  कुछ अवसर परस्त लोग स्वयं तो दिशा से भटक गये है और दूसरों को भटकाने का प्रयास कर रहे है, लेकिन वन विभाग के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी संघ भटकने वाला नही है, बल्कि दुगने उत्साह के साथ संगठन को मजबूत करने जुटा हुआ है तथा बाहरी तत्वों द्वारा जो संघ से बाहर किये गये है उनके द्वारा अवसर परस्ति का लाभ उठाते हुए, बरगलाने, बांटने का कुत्सित प्रयास भी किया जा रहा है परंतु दैनिक वेतन भोगी वन कर्मचारी संघ के निष्ठावान पदाधिकारी आज भी पूरी ऊर्जा, विश्वास निष्ठा के साथ डटकर वन कर्मियों के आत्म समान के हितों की सुरक्षा एवं अधिकारों की लडाई लड़ रहे है जिसके प्रभाव से  अन्य अवसर वादी द्वारा लुभावने वादे कर सदस्यों को बरगलने,पथ भ्रष्ट करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है जिनका  संगठित सदस्यों पर विपरित प्रभाव नही आने वाला.