पर्यावरण दिवस मना लेने से क्या प्रदूषण मुक्त भावी पीढी को बचाया जा सकता है
अलताफ़ हुसैन
रायपुर (छत्तीसगढ़ वनोदय न्यूज़) प्रकृति ने हमें स्वर्ग जैसी धरती मां दी है जिसमें ऊँचे ऊँचे गगन चुंबी पर्वत माला, नदी, सागर, समुद्र, पेड़,पौधे, वन संपदा से इस प्रकार उसका शृंगार और सुसज्जित कर रखा है जो संपूर्ण जगत के वासियों को अब चाहे वह मानव हो या जीव जंतु, सब के लिए वरदान रूपी जीवन दायिनी मानी जाती है जिसमें शुद्ध ऑक्सीजन के साथ जल, वायु, ऋतु परिवर्तन जैसी प्रकृतिक भगौलिक व्यवस्था दे रखी है परंतु उक्त ईश्वरीय वरदान का विदोहन आर्थिक लाभ एवं निज स्वार्थ सिद्धि के लिए लगातार मानव वर्षों से कर प्रकृति एवं पर्यावरण के खिलाफ असंतुलिन व्यवस्था निर्मित कर जीव, जंतु, मानव,वायु मंडल,के साथ मौसमी ऋतु प्रकृति व्यवस्था के साथ खिलवाड कर उसका हास एवं क्षति पहुंचाने रात दिन जुटा हुआ है परिणामतः इसका खामियाज़ा वर्तमान पीढी को भुगतना पढ़ रहा है लगातार ग्लोबल वार्मिंग एवं आकाशीय ओजान परत में निरंतर बढ़ रहे छिद्र का वृद्धि होना इस बात का स्पष्ट संकेत दर्शाता है कि पृथ्वी का अंत और वहां के समस्त मानव,जीव जंतु के लिए पल पल खतरा बढ़ते जा रहा है केवल वर्ष में एक बार निर्धारित दिवस तिथियों, पर्व मनाने जैसी कागजी औपचारिकता पूर्ण करने मात्र से क्या हम प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण,सुरक्षा का मानक नैतिक दायिरव व्यवस्था पर सार गर्भित कदम उठाना मान ले ?
आकाशीय ओजान परत, एवं ग्लोबल वार्मिंग का सीधा संबन्ध धरती में निवासरत मानव जगत एवं जीव जंतु के साथ जल जंगल के सूक्ष्म किटाणुओ से लेकर कीट पतंगों जलचर थलचर, नभचर सरीसृप,पर गहरा प्रभाव पड़ता है अत्याधुनिक फोर जी, फाइव जी नेट वर्किंग संचालित तरंगों से अनेक नभचर, पक्षी असामयिक उनकी इह लीला समाप्त हो रही है इसका मूल कारण लगातार पेड़,पौधों, एवं वनों का लगातार विदोहन,आधुनिक, गाड़ी, मोटर यान,जैसी मशीनरी व्यवस्था का निरंतर उपयोग, एवं उसके निकलने वाली दम घोटु जानलेवा धूल धुसरित, धुंआ,शहरीकरण के नाम पर क्रांकिट के जंगल निर्माण से शुद्ध देने वाला ऑक्सिजन पेड़ पौधों का खात्मा, आधुनिकता की दौड़ में विकसित नवीन यंत्रों का निर्माण एवं विकास उन्नति प्रगति के नाम पर कुकुर मुत्ते की भाँति कान फोडू चिंघाड़ती कल कारखाने,की आवाज़ और अलाउद्दीन के जादुई चिराग की भाँति चिमनियों से उसकी निकलती हुई कार्बन डाई ऑक्साईड की काले धूंए का जिन्न के समान ज़हरीली हवा अदृश्य वायु मण्डल में तैरते सूक्ष्म लौह कण किसी भी स्वस्थ्य, मानव जीव जंतु को व्याधि ग्रस्त करने पर्याप्त है इसका साक्षात उदाहरण चल रहे इक्किस्वी सदी में अनेक ला इलाज बीमारी से आम जन पीड़ित हो चुके है तथा निश्चित औसत आयु से पूर्व ही काल के गाल में समा रहे है
प्रकृति एवं पर्यावरण को खतरा निकलने वाली कल कारखाने, गाड़ी वाहन से निकलने वाले प्रदूषण के अलावा पेड़ पौधों और वनों का लगातार विदोहन विनाश भी इसका मुख्य कारण माना जा रहा है क्योंकि निकलने वाले धूंए कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषित करने की क्षमता पेड़ पौधे वन मे होती है परंतु वन्य प्राणियों के रहवास क्षेत्र वन क्षेत्रों को भी मानव ने अतिक्रमण करना प्रारंभ कर दिया है स्वयं की सुविधा एवं प्राकृतिक जंगल में पिकनिक मनाने होटल, मोटल, फार्म हाउस, का निर्माण धड़ल्ले से हो रहा है काष्ठ माफिया इमारती काष्ठों का लगातार पातन कर रहे है वन क्षेत्रों के आसपास ग्रामीण वन वासी कृषि फसल उपज बढ़ाने की लालसा में भूमि अतिक्रमण कर वनों के पेड़ पौधों का विदोहन और धीरे धीरे कृषि भूमि का रकबा का दायरा बढ़ाया जा रहा है जिसकी वजह से वन क्षेत्रों का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है बचे खुचे वन्य प्राणी अवसाद मे आकर यत्र तत्र पलायन कर भटक रहे है और दुर्घटना सहित उनका शिकार अलग हो रहा है जब वन, पेड़ पौधे, हरियाली ही नही रहेगी तो स्वभाविक है प्रकृति पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव तो पड़ना लाजिमी है
विश्व पर्यावरण दिवस विगत अनेक वर्षों से बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है तथा प्रदूषण से लड़ने एकजुटता के साथ संकल्प लिया जाता है परंतु कथित मानव द्वारा वर्षों से मनाया जाने वाला पर्यावरण दिवस अब.....ढाक के वही तीन पात... वाली कहावत को चरितार्थ करते नज़र आती है न प्रदूषण के विरुद्ध कोई वैकल्पिक व्यवस्था नियम बनते है और न ही छपास रोगी लोगों द्वारा फोटो खिंचवा कर पेड़ पौधे रोपण वाले स्थान की सुरक्षा व्यवस्था की जाती है नतीजतन आगामी वर्ष में पर्यावरण दिवस में फिर से वही अखबारी छपास कार्यक्रम में उत्साह वर्धन के साथ बड़ी शिद्दत से शिरकत करते है इसका परिणाम यह होता है कि परिवर्तित ऋतु चक्र के कारण अनेक स्थानों पर बेतहाशा वर्षा तो कहीं पर खंड वर्षा, कही जल स्त्रोत रसातल मे पहुँच रहे है तो कहीं पर असंतुलन की वजह से भगौलिक परिस्थिति मे हलचल की वजह से भूकंप का सामना करना पढ़ रहा है यह आपदाएं स्पष्ट संकेत देता है कि पृथ्वी और आकाश आज सुरक्षित नही रहा है
सवाल उठता है कि क्या सिर्फ वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की मौलिक जिम्मेदारी बनती है कि प्रति वर्ष करोड़ों रुपये व्यय करके आम जनता को निशुल्क पौधे वितरण कर हरियाली लाने को प्रोत्साहित करती है असंतुलित पर्यावरण के प्रकोप उसके निराकरण के उद्देश्य से प्राकृतिक एवं पर्यावरण प्रेमियों की पहल से मूल वन विभाग का नाम वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग कर उनको नैतिक जवाबदेही सुनिश्चित की गई है तथा वह अपने मौलिक दायित्वों का निर्वहन बखूबी कर भी रहा है परंतु आम जनता की पर्यावर्णीय सुरक्षा एवं सहभागिता नाम मात्र रह गई है पर्यावरण दिवस के उपलब्ध पर बड़े बड़े अखबारों के फ्रंट पेज में हरियाली प्रसार का ढिंढोरा पिटने वाले संस्थानों, समूह,दल द्वारा फोटो खिचवाने तक औपचारिकता भर रहती है और आगामी वर्ष देखा जाए तो रोपे जाने वाले पौधों का नामो निशान नही दिखता इस संदर्भ में जन जगरूकता लाने के बहुद्देशीय कार्य करने के लिए भारत देश के यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने आम जन को....एक पेड़ मां के नाम...जैसी बहुआयामी योजना लागू की है इसका उद्देश्य था कि आम लोग अपनी जीवन दायिनी मां के नाम से जन जागरूक हो कर प्रकृति हरियाली और पर्यावरण की ओर आकर्षित होकर रोपे गए पेड़ पौधों की सुरक्षा, व्यवस्था मे योगदान करे परंतु केवल यह योजना भी सामाजिक कार्यक्रमों एवं स्कूली बच्चों, द्वारा लगाए जाने तक सीमित रह गया जबकि उद्योग घरानों द्वारा सामाजिक उत्तर दायित्व , (सी.एस.आर.)के तहत उद्योगों द्वारा कार्बन उत्सर्जन कम करने विस्तृत क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पेड़ पौधों एवं प्लांटेशन सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों जिसमें वन विभाग, एवं वन विकास निगम के मध्यम से कराया जाता है ताकि प्रदूषण नियंत्रण रखा जा सके जो कि हद तक किया भी जाता है परंतु आने वाली कोई भी सरकार ऐसे प्लांटेशन स्थलों का चयन कर किसी भी कार्पोरेट घरानों निजी फार्म हाउस,भू माफियाओं को प्रदान कर क्षेत्र को पेड़ पौधे विहीन कर देती है राजधानी रायपुर स्थित वन विभाग के अधिकारियों की मानें तो राजधानी मे जून जुलाई में होने वाले निशुल्क पौधे वितरण, विभाग द्वारा कराए जाने वाले पौधा वृक्षारोपण, प्लांटेशन के लिए भूमि स्थल ही नही है ऐसी स्थिति में पर्यावरण सुरक्षा से कैसा लड़ा जा सकता है नतिजतन, क्षेत्र भयंकर ग्रीष्म एवं अनेक प्राकृतिक आपदाओं से जूझेगा यह तय है वही कॉर्पोरेट घरानों का यह भी उत्तर दायित्व बनता है कि कृषि क्षेत्र और प्रदूषित क्षेत्रों मे बड़ी उड़न पंखे जैसे उपकरण लगाना साथ ही धुंआ क्षेत्रों मे कृतिम बारिश की व्यवस्था भी आवश्यक है परंतु ऐसी प्रक्रिया छ्ग प्रदेश में नज़र नही आती वही औद्योगिक कचरो का सुरक्षित निष्पादन,प्रबंधन करना।भी उनका दायित्व बनता है परंतु ज़हरीले धूल धुंए में मिश्रित अनेक लौह कण से आम नागरिक जीव जंतु प्रभावित होकर श्वास दमा टीबी, कैंसर, क्षय रोग जैसे जटिल गंभीर रोग से ग्रसित हो रहे है जिसका स्थायी समाधान अब तक सुनिश्चित नही किया गया प्रकृति,और पर्यावरण की सुरक्षा और समाधान के लिए शासन और प्रशासन को कड़े नियम निर्धारित करना चाहिए जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने रहवास क्षेत्र नवीन निर्मित भवन अनुज्ञा मे कम से कम एक पेड़ लगवाए साथ ही रोपे गए पेड़ पौधों की सुरक्षा व्यवस्था भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए अधिकतम मुख्य मार्ग,शासकीय रिक्त पड़त भाटा भूमि क्षेत्र मे प्रशासन प्रत्येक पांच से दस फीट की दूरी पर पेड़ पौधे और हरियाली को बढ़ावा दे इसकी सुरक्षा व्यवस्था स्थानीय ग्राम पंचायत को सौपा जाना चाहिए लापरवाही की स्थिति में अर्थदंड के अलावा उनसे उतने पेड़ पौधों लगाने आदेश जारी करना चाहिए , शहरी क्षेत्र के अधीन कल कारखाने,फैक्ट्रियों को कचरा प्रबन्धन का दायित्व, धूल धुंए फैक्ट्रियों को कृतिम वर्षा या आसपास क्षेत्र में टैंकरों के मध्यम से पानी छिड़काव्, चिमनी के समीप एवं कृषि क्षेत्र जैसे खेत खलियानों मे बडा उड़ावनीपंखे, लगवाए जाएं तभी किसी भी क्षेत्र के रहवासी प्रदूषण मुक्त सुरक्षित रह सकेंगे नही तो वह दिन दूर नही जब लगातार बढ़ते प्रदूषण,अदृश्य वायु मंडल मे तैर रही लौह,कण,रासायनिक ज़हरीली धूल धुंए से मिश्रित वायु मण्डल प्रकृति,एवं पर्यावरण को प्रदूषित कर संपूर्ण क्षेत्र, देश दुनिया को शनैः शनैः बर्बादी की कगार मे ला कर खड़े कर देगी जिसमें असंतुलित ऋतु, जलवायु तो हम वर्तमान में देख और समझ रहे है परंतु आने वाले कुछ वर्षों पश्चात लगातार बढ़ रहे प्रदूषण का प्रभाव इतना अधिक होगा कि प्रत्येक व्यक्ति सांस लेने के लिए हजारों रुपये देकर शुद्ध ऑक्सीजन सिलेंडर खरीद कर पीठ पर लाद कर चलता हुआ नज़र आएगा.





































