बंदूक छोड़ हाथों में थामी विकास की डोर:
वन विभाग सुकमा के तुंगल इको-पर्यटन केंद्र में आत्मसमर्पित महिला नक्सली लिख रही है नई कहानी
रायपुर/सुकमा (छत्तीसगढ़ वनोदय न्यूज़) जिले में वन विभाग की एक अभिनव पहल ने विकास और पुनर्वास की नई इबारत लिख दी है। प्रदेश के वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) अरुण कुमार पाण्डेय के कुशल नेतृत्व में वन विभाग सुकमा जिले के तुंगल इको-पर्यटन केंद्र आज आत्मनिर्भरता का एक वैश्विक मॉडल बनकर उभरा है।
सुकमा नगर से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित यह स्थल, जो कभी उपेक्षित और जर्जर था, अब प्राकृतिक सौंदर्य और सामाजिक बदलाव का संगम बन चुका है। वन विभाग ने जर्जर हो गयी संरचनाओं को पुनर्जीवित कर यहाँ एक आकर्षक टापू और पर्यटन केंद्र विकसित किया है, जो न केवल स्थानीय लोगों बल्कि पड़ोसी राज्य ओडिशा के पर्यटकों को भी अपनी ओर खींच रहा है।
इस केंद्र की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का 'तुंगल नेचर कैफे' है, जिसे 'आत्मसमर्पण पुनर्वास महिला स्वयं सहायता समूह' की 10 जांबाज महिलाएँ संचालित कर रही हैं। वन मंत्री केदार कश्यप की सोच के अनुरूप, समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के इस अभियान में उन 5 महिलाओं को शामिल किया गया है जिन्होंने नक्सलवाद का रास्ता छोड़ आत्मसमर्पण किया है, साथ ही 5 ऐसी महिलाएँ भी हैं जो स्वयं नक्सल हिंसा की पीड़ित रही हैं। इन महिलाओं को जगदलपुर और सुकमा के प्रतिष्ठित संस्थानों में विशेष प्रशिक्षण दिलाकर पेशेवर रूप से काम करने के लिए तैयार किया गया है।
आज कुहराम रामे, मुचाकी सोमे, मडकम पोंजे, माड़वी बुदरी और कलमु पायके जैसे नाम, जो कभी संघर्षों के बीच थे, अब मुस्कान के साथ पर्यटकों की मेजबानी कर रहे हैं। उनके साथ मडकम रामे, पोडियम सरोज, अनीता मुचाकी, ललिता यादव और पुनेम भरत कंधे से कंधा मिलाकर स्वावलंबन की राह पर चल रहे हैं।
इस पर्यटन केंद्र की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 31 दिसंबर 2025 को इसके शुभारंभ के बाद से मात्र तीन महीनों में यानी 30 मार्च 2026 तक यहाँ 8,889 पर्यटक पहुँच चुके हैं। इस छोटी सी अवधि में केंद्र ने लगभग ₹2.92 लाख की आय अर्जित की है। यहाँ आने वाले पर्यटक न केवल कैफे के स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद ले रहे हैं, बल्कि तुंगल डैम में कयाक, पैडल बोट और बाँस राफ्टिंग जैसी रोमांचक गतिविधियों का भी लुत्फ उठा रहे हैं।
माननीय वन मंत्री केदार कश्यप व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) अरुण कुमार पाण्डेय के निर्देशन में बने इस परियोजना ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही अवसर और विश्वास प्रदान किया जाए, तो बंदूक की जगह सम्मानजनक रोजगार लेकर जीवन को पूरी तरह बदला जा सकता है। तुंगल इको-पर्यटन केंद्र आज केवल सैर-सपाटे की जगह नहीं, बल्कि उन महिलाओं के साहस और वन विभाग की दूरदर्शी सोच का प्रतीक है, जो बस्तर की बदलती और सुनहरी तस्वीर पेश कर रहा है। यह केंद्र संदेश दे रहा है कि प्रकृति संरक्षण और मानव विकास को एक साथ जोड़कर समुदायों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सकता है।


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