मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

रायकेरा रोपणी के पचास साल हरियाली बनी बेमिसाल

 रायकेरा रोपणी के पचास साल 

हरियाली बनी बेमिसाल


आलताफ़ हुसैन



रायपुर (छत्तीसगढ़ वनोदय)  

इस बार इंतज़ाम तो सर्दी का हो गया

क्या हाल पेड़ कटते ही बस्ती का हो गया


उपरोक्त पंक्तियां नोमान शौक का है जिसमे उन्होंने दो पंक्तियों में ही कितनी गूढ़ रहस्य बात कह दी जिसमे उन्होंने पेड़ पौधे हरियाली और मानव व्यवस्था की वो चुनौती पूर्ण व्याख्या कर दी कि पर्यावरण एवं प्रकृति के अस्तित्व के साथ मानव के मौलिक ढांचा पर प्रहार करते ही यक्ष सवाल खड़ा कर दिया है कि वनों, पेड़,पौधों का रिश्ता मानव समाज में आज से नही बल्कि जन्म जन्मांतर से समूल जड़ की गहराई तक जुड़ा हुआ है पेड़ पौधों की उपस्थिति मात्र से  वातावरण में  शुद्ध, स्वच्छ ऑक्सिजन प्राप्त तो मिलता ही है परंतु उनके आसपास भगौलिक रिक्तता होनें की दशा में बसा बसाया  बस्तियाँ भी उजाड़ और वीरान सी प्रतीत होती है  यही बजह है कि पेड़,पौधे हरियाली प्रसार, विस्तार के लिए छग प्रदेश का वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के साथ उनके आनुवंशिक् धडा वन विकास निगम अनेक क्षेत्रों में लुप्त प्रायः सागौन के अस्तित्व को अक्षुण्य बनाए रखने वृहद स्तर पर रोपणी, नर्सरी का निर्माण कर स्थानीय प्रदेश सहित बाहरी प्रदेशों के क्षेत्रों में पेड़ पौधों विशेष कर सागौन रूट शूट का उत्पादन कर असंतुलित जलवायु को नियंत्रित करने का पुनीत कार्य कर रहा है साथ ही वन विकास निगम अपनी आर्थिक स्थिति को  सुदृढ़ करता ही है साथ ही हरियाली प्रसार करने में अपनी महती भूमिका का निर्वहन भी बखूबी निभा रहा है जिनमें बार नवपारा परियोजना मंडल अंतर्गत सिरपुर के समीप पचास वर्षों से सर्वाधिक प्राचीन रायकेरा रोपणी नर्सरी की अपनी एक पृथक पहचान एवं मिसाल बन चुकी है जहाँ प्रति वर्ष लाखों की संख्या में सागौन  बीजारोपण कर रूट शूट तैय्यार कर उसका विक्रय एवं निर्यात निर्बाध गति से की जा रही है 


       श्रीपुर अर्थात सिरपुर जो मुख्यालय रायपुर जिला से लगभग अस्सी किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जहाँ प्राचीन कालीन अनेक हिंदू देवी देवताओं के मंदीर, बौद्ध विहार सहित पारंपरिक पौराणिक, धार्मिक सांस्कृतिक का मिला जुला रमणिक स्थल है वहाँ से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर वर्ष 1976 में वन क्षेत्रों के मध्य नाले और पोखर के ऊँचाई पर रायकेरा नर्सरी की स्थापना अविभाजित मध्य प्रदेश के समय की गई थी जिसे हरे भरे वन से सटे ग्राम क्षेत्र के समीप ही निर्माण किया गया था वर्तमान 2026 में रायकेर रोपणी अपने संपूर्ण पचास वर्षों के गोल्डन जुबली वर्ष के बे मिसाल पायदान मे पदार्पण कर हरित उत्सव वर्ष मना रहा है भले ही छ्ग वन विकास निगम जिसकी रायकेरा नर्सरी सागौन पौधों की ही नही बल्कि वन विकास निगम कर्मियों, एवं वहाँ वर्षों से आसपास ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की भी पालनहारी जननी है  क्योंकि वसुंधरा के गर्भ में सागौन बीजारोपण कर अंकुरित नन्हे नन्हे हरित गुलाबी कोमल पत्तों में जब सूर्य देवता अपनी पहली नारंगी आभा की दिव्य  किरण से उनिंदा कुमल्हाते हुए भोर में जब सागौन बीज के कोमल पत्ते इठलाकर अंगड़ाई लेते हुए गर्भा धरती से पुलकित होते है तब ऐसा प्रतीत होता है जैसे सूर्य देवता उनके दीर्धायु होने का आशीर्वाद देकर धरती पर आगमन पर उनका सुस्वागतम कर रहे हो यह देव तुल्य आशीर्वाद इनकी मानव रूपी आयु के समान होता है उल्लेखनीय है कि सागौन पेड़ की सामान्य आयु 50 से 100 वर्ष के बीच होती है, लेकिन अच्छी स्थिति में ये 200 वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।  जबकि प्राकृतिक वनों में यह 50से 80 वर्ष या उससे अधिक अवस्था में परिपक्व होता है। जो आज भी बार अभ्यारण का मणिराम पलांटेशन उसका साक्षात उदाहरण है 

 रायकेरा रोपणी अपने प्रारंभिक वर्ष 1976 के पश्चात अनेक राज्यों में यहाँ के रूट शूट से रोपण किया जा चुका है जिनमें मुख्यतः केरल, महाराष्ट्र तमिलनाडु, मध्य प्रदेश सहित महाराष्ट्र तक यहाँ के पौधे आज भी आपनी आभा और चमक बिखेर रहे है वर्ष2025- 2026 में लगभग अठारह लाख रूट शूट पौधे रोपणी में तैयार किये गए थे जिसका स्थानीय प्रदेश सहित भिन्न भिन्न राज्यों में विक्रय, वितरण किया जा चूका है


यह जानकारी छ्ग राज्य वन विकास निगम बार नवापारा परियोजना मंडल  के ऊर्जावान डिवीजनल मैनेजर (डी. एफ.ओ.) चंद्र कांत टीकरीया एक संक्षिप्त चर्चा मे कही वे आगे बताते है कि वित्तीय वर्ष,2026-2027 में भी अट्ठारह लाख सागौन रूट शूट तैयार करनें का विशाल लक्ष्य है उन्होंने बताया इसकी प्रारंभिक प्रक्रिया चालू कर दी गई है बार परियोजना मंडल के डी एम चंद्र कांत टीकरिया  बताते है कि सागौन शिड तैयार करनें में अनेक जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है जिसकी अवधि लगभग एक वर्ष तक की होती है उन्होंने बताया सर्व प्रथम  इसका बीज क्रय करने के लिए स्थानीय क्षेत्रों के अलावा कवर्धा मध्य प्रदेश के देवास महाराष्ट्र के भंडारा  जिले सहित अन्य राज्यों से सौ या उनसे अधिक वर्षीय स्वस्थ्य सागौन पेड़ से संकलित किये बीज  क्रय कर रखे जाते है पश्चात चालीस से पैतालिस प्रतिशत डिग्री तापमान पर इसे सुखाया जाता है ताकि बाहरी अवरण स्वमेव छोड़ अंदर की नमी को समाप्त कर सके यह प्रक्रिया करने से प्राप्त बीज को नमी या भिगोकर तीव्र तापमान में उलट पलट करते  हुए  सुखाया जाता है बारंबार प्रत्येक दो से तीन घंटे में यह प्रक्रिया अनवरत जारी रहती है जिसकी वजह से सागौन बीज मे पचीस से तीस प्रतिशत वजन में कमी आ जाती है छ्ग राज्य वन विकास निगम बार नवापारा परियोजना मंडल के डी एम चंद्र कांत टीकरिया आगे बताते है कि लगातार बीज प्रोसेसिग की  प्रक्रिया की वजह से इसका बाहरी आवरण छिलका, हट जाता है एवं सुखाई, बाह्य अवरण गुठली निकलने की वजह से बीज लगभग  पचास प्रतिशत से भी कम प्राप्त होता है  इस बीच नमी भी दी जाती है ताकि सागौन गुठली का बाहरी अवरण ग्रीष्म तापमान से हट कर मूल बीज चिरौजी पूरी तरह से शुष्क हो सके जिसमें इसके रोपण में तेजी से वृद्धि होती है यह प्रक्रिया लगातार पांच से सात सप्ताह तक किया जाना उन्होंने बताया है 


  सागौन रोपण सहित अन्य जानकारी लेने जब

छत्तीसगढ़ वन विकास निगम बार नवा पारा परियोजना मंडल के उप वन मण्डलाधिकारी चित्रा त्रिपाठी से ली गई तो उन्होंने बताया कि रायकेरा रोपणी आज इस वर्ष अपनी पचासवीं वर्ष मना रहा है जो वहाँ के श्रमिकों के लिए रोजगार सृजन का सशक्त मध्यम माना जाता है क्योंकि यहाँ बारह मासी रोजगार उपलब्ध होता है एक प्रकार से उन श्रमिकों के लिए रोपणी किसी बैंक से कम नही है जहाँ प्रति दिन उनके बैंक खाता में पारिश्रमिक कलेक्टर दर पर डाले जाते है छ्ग वन विकास निगम बार परियोजना मंडल की डीडीएम चित्रा त्रिपाठी  आगे बताती है कि रोपणी में रायकेरा, सुकुल बाय, खमतराई, मरौद् क्षेत्र के श्रमिको को आवश्यकता अनुसार रोजगार उपलब्ध कराया जाता है उन्होंने बताया रायकेर रोपणी में  बीस या उससे अधिक श्रमिको को प्रतिदिन रोजगार प्राप्त होता है यह संख्या अवश्यक्तानुसार कम अथवा ज्यादा भी होता है उन्होंने बताया कि गुणवत्ता परक वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण भी स्थानीय रोपण  क्षेत्र के छायादार अथवा नर्सरी प्रांगण में किया जाता है जिसमें गोबर खाद काली मिट्टी के साथ सुखे पत्ते, कटे हुए पैरा ,कृषि अवयव की संतुलित मात्रा एवं स्वस्थ्य केंचुआ का मिश्रण किया जाता है डेढ़ से दो माह मे लगातार नमी बरकरार रखने पर गुणवत्ता पूर्ण वर्मी कमपोस्ट चाय की पत्ती के समान मिलता है जो रोपणी के लिए अत्यधिक लाभदायक होता है इसके मिश्रण से सागौन बीज के नव पुल्कित पौधे उत्पादन सहित तेजी से सर्वाइव करता है वविनि बार परियोजना मण्डल की डीडीएम  मैडम चित्रा त्रिपाठी ने आगे बताया कि  सागौन रोपण के साथ साथ बेहतर उपचार से उत्कृष्ट सागौन पौधे प्राप्त होते है इसे लिए नवजात शिशु रूपी  सागौन पौधों के लिए लगातार महिला व पुरुष श्रमिक पूरी ईमानदारी से अपने  कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे है


वानिकी कार्यों निंदाई गुड़ाई उपचार सहित समस्त सिंचाई कार्य का दायित्व महिलाएं कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है मैडम त्रिपाठी जी ने आगे बताया कि महिला सशक्तिकारण की मिसाल यदि देखना हो तो यहां रायकेरा नर्सरी में देखा जा सकता है जहाँ छ्ग शासन के मुख्यमन्त्री विष्णु देव साय के मंशा अनुरूप वानिकी कार्यों से संदर्भित सभी कार्यों का निष्पादन आज से नही बरसों बरस से करते आ रही है जो रायकेरा रोपणी के लिए एक उपलब्धि भी है एवं एक प्रेरणादायी भी है 


 सागौन बीज के प्रोसेसिंग का साक्षात प्रक्रिया ज्ञात करने जब रायकेरा नर्सरी सिरपुर पहुंचा गया तब वहाँ खुशमिजाज, कर्तव्यपरायण, हंसमुख, मिलनसार, कर्मठ, व्यक्तित्व के धनी रायकेरा परिक्षेत्र अधिकारी हरि राम पैकरा से मुलाकात कर उनसे सागौन रोपण के संदर्भ में जब जानकारी ली तो उन्होंने बताया कि बीज प्रोसेसिस अगस्त से नवंबर माह तक वेदर में किया जाता है पश्चात अप्रेल मई की कड़ाके की ग्रीष्म ऋतु में बीज को उथल पुथल किया जाता है जिससेे उसकी बाह्य आंतरिक, आवरण जिसमें छिलका, गुठली निकल कर आंतरिक  बीज की चिरौंजी पूरी तरह से सख्त होने के पश्चात चालीस या उससे अधिक डिग्री तापमान पर  मदर ट्री बेड में डाल दिया जाता है परिक्षेत्राधिकारी हरि राम पैकरा बताते है कि भूमि तैयारी नवंबर  से चालू हो जाता है जिसमें प्लाउ नागर से एक फीट गहराई तक पांच से अधिक बार जुताई किया जाता है जिसकी वजह से मृदा उपजाऊ हो जाता है रेंजर हरि राम पैकरा आगे बताते है कि उपचार के रूप में  जैविक बर्मी कम्पोस्ट एस.एस.पी. सुपर फास्ट खाद दस किलो मिक्स कर डाला जाता है वह इस वजह से भी किया जाता है ताकि मृदा के सूक्ष्म जीवाणु का नाश होता है 
तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है वे बताते है कि रायाकेरा नर्सरी बार परियोजना के सिरपुर स्थित कक्ष क्रमांक 81 वन क्षेत्र में निर्मित है तथा जहां लगभग 63 हेक्टेयर क्षेत्र में 0. 25 मीटर ऊँचाई 1 मीटर ऊँचाई तथा 10 मीटर लंबाई में बैड तैयार किया जाता है जिसमे सौ लाइन नाली खीची जाती है इसमें दस सेंटी मीटर अंतरल में सौ नाली में पचास से पचपन बीज एक लाइन में रोपा जाता है  रायकेरा  रेंजर हरिराम पैकरा आगे बताते  है कि काली मिट्टी युक्त उक्त नाली में वर्मी कंपोस्ट जैविक खाद से बीज को ढँक दिया जाता है तथा उस के उपर पैरा, कृषि अवयव से ढंक दिया जाता है ताकि पानी सिंचाई से बीज की क्षति न हो तथा सिंचाई जल से बीज को बहा कर न ले जाए इसकी देखरेख मॉनिटरिंग तब तक की जाती है जब तक सागौन बीज के महीन पौधे बाहर न निकल जाए 


पैरा तकनीक के संदर्भ में पूछे जाने पर समीप बैठे नर्सरी प्रभारी ललित रात्रे का कथन है कि पैरा रहने की वजह से रोपण क्षेत्र में बराबर नमी बनी रहती है तथा सुरक्षा के साथ तापमान नियंत्रित रहता है इसके लिए नियमित सिंचाई आधुनिक स्प्रिंकलर विधि से की जाती है यह प्रक्रिया टंकी मे बड़ा मोनो ब्लॉक मशीन से किया जाता है रायकेरा रोपणी प्रभारी ललित रात्रे आगे बताते है कि इस दौरान पैरा आवरण को साफ कर दिया जाता है जिनमे पचपन बीज में से दस से बारह पौधे प्रति नाली में निकल जाते है  अधिकतम इक्कीस दिन बाद वर्षा ऋतु के समय निंदाई गुडाइ कर कीट नाशक डी. ए. पी. मिलाकर डाला जाता है ताकि सागौन पौधे सर्वाईव कर सके रायकेरा नर्सरी प्रभारी ललित रात्रे ने सागौन देने या वितरण के संदर्भ में बताया कि मांग के अनुसार ढाई से तीन फीट ऊँचाई होने पर रूट शूट काट कर स्टैंडर्ड तरीके से मिट्टी मे एक इंच उपर तथा चार से आठ इंच अंदर मिट्टी में दबा कर रोपण किया जाता है अब सवाल यह उठता है कि वन विकास निगम कर्मियों द्वारा छ से आठ माह के अथक परिश्रम के पश्चात रोपणी के निकले पौधे उनके रूट शूट स्थानीय छत्तीसगढ़ राज्य सहित अन्य राज्यों में मांग के अनुकूल सभी स्थल में सागौन रूट शूट रोपे जाएंगे तथा बीतते समय एवं काल चक्र में ये बाल अवस्था से लेकर किशोर, युवा एवं परिपक्व भी होंगे जिनसे राहगीरों सहित क्षेत्र में शुद्ध जलवायु एवं वातावरण निर्मित कर आम जन के स्वस्थ्य को अमरत्व प्रदान कर आम जीव जंतु, वन्य प्राणियों सहित मानव जीवन को संचालित करेंगे परंतु प्रकृति की उक्त अनमोल उपहार के बदले में हम मानव समाज उन्हे क्या देंगे ?  


उक्त सवाल का जवाब हमें स्वमेव तलाश करना होगा क्योंकि सिमटते वनों का दायरा  बेतहाशा प्रदूषण,आधुनिक मशीनरी प्रबन्धन, लगातार पेड़ पौधों का विनाश,बढ़ती आधुनिक सुख सुविधा के नाम पर क्रांकिटिकारण, जो हमे शनैः शनैः गर्त की ओर धकेल रही है इस संदर्भ में हिंदुस्तान के सुप्रसिद्ध उर्दू के शायर स्व. सुलेमान ईरानी की सुप्रसिद्ध रचना की चंद पंक्तिया याद आ रही है जो अक्षरशः विलुप्त होते पेड़ पौधे और उन जैसे  सागौन के लहलहाते पेड़ जैसे अपनी वेदना का इजहार उक्त पंक्तियों के मध्यम से व्यक्त कर कह रहा हो कि-

सारे राह एक सिक्का हूं संभालो मुझको

वक्त पर काम ही आऊंगा संभालो मुझको

एक पेड़ हूँ देता हूँ घनी छाँव तुम्हे

कही मिल जुल के अपनों से न कटा लो मुझको ,,, कहीं मिल जुल के अपनों से न कटा लो मुझको.......... कहीं मिल जल के.अपनों......... 


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