बरनवापारा में हाथियों की बढ़ती दस्तक : जंगल, की निगरानी और सह-अस्तित्व की कहानी
अलताफ़ हुसैन /फोटो कृशानु चंद्राकर अधीक्षक बार
रायपुर (छत्तीसगढ़ वनोंदय पत्रिका) छत्तीसगढ़ के हरे-भरे प्राकृतिक परिदृश्य में बसा बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य आज केवल अपनी जैव विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि यहां हाथियों की बढ़ती गतिविधियों के कारण भी चर्चा में है। जंगल में हाथियों की मौजूदगी वन विभाग के लिए संरक्षण की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, वहीं इनके जंगल से बाहर निकलने पर मानव-हाथी संघर्ष की चुनौती भी सामने आती है। ऐसे में निगरानी, त्वरित सूचना तंत्र और ग्रामीणों में जागरूकता इस पूरे प्रयास की महत्वपूर्ण कड़ी बन चुकी हैं।
जंगल जहां हर सुबह एक नई कहानी लिखती है
बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य का प्राकृतिक वातावरण अपने आप में अद्भुत है। घने पेड़ों के बीच से छनकर आती सूर्य की किरणें, शांत जलस्रोत, घास के मैदान और वन्यजीवों की गतिविधियां इस क्षेत्र को विशिष्ट बनाती हैं। सुबह होते ही जंगल में जीवन की हलचल शुरू हो जाती है। कहीं पक्षियों की आवाज सुनाई देती है, तो कहीं वन्यजीव पानी की तलाश में जलस्रोतों की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट और जंगल की प्राकृतिक खामोशी मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाती है, जिसमें प्रकृति स्वयं अपनी कहानी कहती नजर आती है। छत्तीसगढ़ के इसी प्राकृतिक संसार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हाथियों की लगातार मौजूदगी ने अभ्यारण्य क्षेत्र मे अनेक प्रकार की जिम्मेदारी और चिंता भी बढ़ा दी है बरनवापारा क्षेत्र में हाथियों की मौजूदगी कोई बिल्कुल नई घटना नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हाथियों की गतिविधियों और उनके आवागमन को लेकर वन विभाग की निगरानी और सक्रियता बढ़ी है।
वर्ष 2022 के आसपास हाथियों के समूह की गतिविधियां इस क्षेत्र में विशेष रूप से सामने आईं। इसके बाद से हाथियों की मौजूदगी, उनके आवागमन के मार्ग और संभावित संवेदनशील क्षेत्रों पर लगातार नजर रखी जा रही है। बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य लगभग 245 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। घने वन क्षेत्र, घास के मैदान और जलस्रोत हाथियों सहित अनेक वन्यजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराते हैं।हाथियों के लिए जंगल केवल भोजन और पानी पाने की जगह नहीं है। यह उनके पारंपरिक आवागमन मार्ग, सामाजिक जीवन और प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा है।
जंगल में छूटे निशान बनते हैं निगरानी का आधार
हाथियों की निगरानी का काम केवल उन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखने तक सीमित नहीं है। जंगल में हाथी जहां से गुजरते हैं, वहां अनेक संकेत छोड़ जाते हैं। पैरों के निशान, टूटे हुए पेड़, ताजा गोबर, पेड़ों की छाल पर खाने के निशान और वनस्पतियों को नुकसान पहुंचने के तरीके से प्रशिक्षित वनकर्मी उनकी गतिविधियों का अनुमान लगाते हैं। एक अनुभवी निगरानी दल इन छोटे-छोटे संकेतों को जोड़कर यह समझने की कोशिश करता है कि हाथियों का दल किस दिशा में आगे बढ़ा है, उसकी संख्या कितनी हो सकती है और गतिविधि कितनी पुरानी है। यानी जंगल में हाथियों की मौजूदगी का पता लगाने के लिए कई बार हाथियों को देखना जरूरी नहीं होता—उनके पीछे छूटे निशान ही उनकी कहानी बता देते हैं।
रात में और चुनौतीपूर्ण हो जाती है निगरानी
जब सूर्य अस्त होता है और जंगल में अंधेरा उतरने लगता है, तब हाथियों की निगरानी और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
रात के समय हाथियों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में वनकर्मियों को उनकी संभावित लोकेशन पर नजर रखनी पड़ती है और यह पता लगाना होता है कि हाथियों का दल किस दिशा में बढ़ रहा है।हाथियों की सही लोकेशन की जानकारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वन विभाग समय रहते आसपास के ग्रामीणों को सतर्क कर सकता है।
बरनवापारा में हाथियों की निगरानी केवल वन्यजीव संरक्षण का विषय नहीं है। इसके पीछे ग्रामीणों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इस संदर्भ मे बार नवा पारा अभ्यारण्या के युवा अधीक्षक कृषानु चंद्राकर का कहना है कि हाथियों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखना विभाग की प्राथमिकताओं में शामिल है। उनका कहना है कि हाथियों की मौजूदगी को समझने के लिए उनके आवागमन, व्यवहार और गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है। हाथियों की लोकेशन की जानकारी मिलने के बाद संवेदनशील क्षेत्रों में वन अमले को सक्रिय किया जाता है तथा ग्रामीणों को समय पर सतर्क करने का प्रयास किया जाता है।उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मानव और हाथी दोनों की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों की जागरूकता बेहद जरूरी है। हाथियों के नजदीक जाने, उन्हें छेड़ने या उनके रास्ते में आने से बचना चाहिए। वन विभाग और स्थानीय समुदाय के बीच बेहतर समन्वय से संघर्ष की घटनाओं को कम किया जा सकता है।
बार अभ्यारण्य की उत्साही रेंजर रूपेश्वरी दीवान का हाथियों के लगातार मूवमेंट को लेकर उनकी भूमिका के बारे मे बताती है कि हाथियों की गतिविधियों की निगरानी में मैदानी वन अमले की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। रेंजर रूपेश्वरी दीवान और उनकी पूरी टीम को क्षेत्र में हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखने, उनके संभावित मार्गों की जानकारी जुटाने और संवेदनशील इलाकों में सतर्कता बढ़ाने का काम करना पड़ता है।
साथ ही हाथियों की गतिविधि का पता लगते ही आसपास के क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई जाती है। हाथियों की दिशा और उनकी स्थिति के आधार पर आधुनिक तकनीक संचार माध्यमों से ग्रामीणों को सावधान किया जाता है। उनका कहना है कि हाथियों के साथ सुरक्षित दूरी बनाए रखना सबसे जरूरी है। विशेषकर रात के समय ग्रामीणों को हाथियों की गतिविधि वाले क्षेत्रों में जाने से बचने की बात भी कहती है यही नही मैदानी स्तर पर वनकर्मियों और हाथी मित्र दल के बीच समन्वय इस पूरी व्यवस्था को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बार अभ्यारण्य रेंजर रूपेश्वरी दीवान आगे बताती है कि हाथियों की गतिविधि की जानकारी केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह सूचना समय पर ग्रामीणों तक पहुंचना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।इसी उद्देश्य से हाथी मित्र दल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैसे ही हाथियों की मौजूदगी की जानकारी मिलती है, आसपास के गांवों में सूचना पहुंचाई जाती है।ग्रामीणों को बताया जाता है कि हाथी किस दिशा में बढ़ रहे हैं और किन क्षेत्रों में सावधानी बरतने की आवश्यकता है।कई स्थानों पर मुनादी के माध्यम से भी ग्रामीणों को सचेत किया जाता है। ग्रामीणों से कहा जाता है कि रात के समय अनावश्यक रूप से घरों से बाहर न निकलें, हाथियों के नजदीक जाने की कोशिश न करें और हाथियों को घेरने या भगाने का प्रयास कतई न करें। क्योंकि जंगल में एक छोटी-सी असावधानी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।
हाथियों के दल में मादा और बच्चों की महत्वपूर्ण भूमिका
हाथियों के सामाजिक जीवन को देखें तो उनका समूह अपने आप में एक संगठित परिवार की तरह होता है।दल की अनुभवी मादा हाथियों को जंगल के रास्तों और संसाधनों की गहरी जानकारी होती है। उन्हें पता होता है कि कहां भोजन उपलब्ध हो सकता है, किस दिशा में पानी का स्रोत है और किन रास्तों से आगे बढ़ना अपेक्षाकृत सुरक्षित है।छोटे हाथी अक्सर अपनी मां और समूह की अन्य मादा हाथियों के साथ चलते हैं। इसलिए हाथियों के दल को देखकर उन्हें परेशान करना या उनके रास्ते को रोकना बेहद खतरनाक हो सकता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, हाथियों को शांत वातावरण और पर्याप्त दूरी देना ही सबसे सुरक्षित तरीका है।
जब हाथी जंगल से खेतों की ओर बढ़ते हैं
मानव-हाथी संघर्ष की सबसे बड़ी चुनौती तब सामने आती है, जब हाथियों का दल जंगल से निकलकर खेतों या आबादी के आसपास पहुंच जाता है।
किसानों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक होती है। महीनों की मेहनत से तैयार फसल हाथियों की आवाजाही से कुछ ही समय में प्रभावित हो सकती है।
यहीं से संरक्षण की चुनौती और जटिल हो जाती है।
एक ओर हाथी अपने प्राकृतिक व्यवहार के अनुसार भोजन और पानी की तलाश में आगे बढ़ते हैं, दूसरी ओर खेतों और गांवों में रहने वाले लोगों के लिए उनकी मौजूदगी आर्थिक नुकसान और सुरक्षा की चिंता पैदा करती है।
इसलिए समाधान केवल हाथियों को भगाने में नहीं है।
समाधान है—समय पर सूचना, बेहतर निगरानी, ग्रामीण जागरूकता और वन विभाग तथा स्थानीय समुदाय के बीच मजबूत समन्वय।
सह-अस्तित्व ही सबसे बड़ा समाधान
बरनवापारा में हाथियों की कहानी केवल वन्यजीव संरक्षण की कहानी नहीं है। यह इंसान और प्रकृति के बीच संबंध की भी कहानी है।।हाथी जंगल की सीमा को उस तरह नहीं समझते, जिस तरह इंसान नक्शे और सीमाओं के माध्यम से समझता है। उनके लिए जंगल, पानी, भोजन और पारंपरिक आवागमन मार्ग एक प्राकृतिक परिदृश्य का हिस्सा हैं। इसीलिए हाथियों को केवल एक क्षेत्र में रोक देना आसान समाधान नहीं है।जरूरत इस बात की है कि उनके आवागमन को समझा जाए, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की जाए और उन क्षेत्रों में पहले से सतर्कता बरती जाए। आज वन्यजीव निगरानी में तकनीक का महत्व लगातार बढ़ रहा है। कैमरा, संचार व्यवस्था, लोकेशन संबंधी जानकारी और अन्य आधुनिक साधनों से निगरानी को बेहतर बनाया जा सकता है। लेकिन जंगल को समझने वाले मैदानी वनकर्मियों का अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किस दिशा में टूटे पेड़ मिले हैं, गोबर कितना ताजा है, पैरों के निशान किस ओर जा रहे हैं और वनस्पतियों पर किस तरह के खाने के निशान हैं—इन संकेतों को समझने में वर्षों का अनुभव काम आता है।तकनीक और मानवीय मूल्यों और अनुभव का यही मेल हाथियों की निगरानी को अधिक प्रभावी बना सकता है।
एक जंगल, दो पक्ष और एक साझा भविष्य
बरनवापारा में हाथियों की मौजूदगी प्रकृति के स्वस्थ और जीवंत होने का संकेत भी है। लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है।
हाथियों को सुरक्षित रखना है।
जंगल को सुरक्षित रखना है।
किसानों की आजीविका की रक्षा करनी है।
और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है।
इन सभी लक्ष्यों को साथ लेकर चलना ही असली चुनौती है।
बरनवापारा की कहानी हमें यह सिखाती है कि वन्यजीव संरक्षण केवल जंगल के भीतर की गतिविधि नहीं है। इसका सीधा संबंध जंगल के आसपास रहने वाले लोगों से भी है।
जब वन विभाग निगरानी करता है, हाथी मित्र दल सूचना पहुंचाता है, ग्रामीण सावधानी बरतते हैं और वन्यजीवों के व्यवहार को समझने की कोशिश की जाती है—तभी सह-अस्तित्व की राह मजबूत होती है।
रात के सन्नाटे में जब हाथियों का दल जंगल की पगडंडी पर आगे बढ़ता है, तो वह अपने साथ केवल एक यात्रा नहीं कर रहा होता। वह जंगल के उस प्राकृतिक अधिकार की कहानी भी कह रहा होता है, जिसमें हर जीव के लिए जगह है। बरनवापारा में हाथियों की मौजूदगी हमें याद दिलाती है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं है। यह अनगिनत जीवों का घर है और एक ऐसा जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसमें इंसान भी कहीं न कहीं सहभागी है। हाथियों को जंगल और गांव की मानवीय सीमाएं समझाना संभव नहीं।लेकिन इंसान इतना जरूर सीख सकता है कि जंगल के इन विशाल मेहमानों के साथ कैसे सुरक्षित दूरी, समझदारी और संवेदनशीलता के साथ रहा जाए।क्योंकि संरक्षण का अंतिम उद्देश्य हाथियों को इंसानों से दूर करना नहीं, बल्कि ऐसा संतुलन बनाना है जिसमें हाथी भी सुरक्षित रहें और इंसान भी।यही बरनवापारा की सबसे बड़ी कहानी है—जंगल की कहानी, हाथियों की कहानी और सह-अस्तित्व की कहानी।










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